ग़ज़ल
गर ख़ामुशी से फ़ाएदा इख़्फ़ा-ए-हाल है
گر خاموشی سے فائدہ اخفاے حال ہے
यह ग़ज़ल खामोशी के उन विरोधाभासी लाभों को दर्शाती है जिससे व्यक्ति की वास्तविक स्थिति छिप जाती है, और एक गहरे अलगाव की ओर ले जाती है जहाँ अनकही इच्छाएँ हृदय में जमा होती रहती हैं। यह ईश्वर की उस रहस्यमयी दयालुता पर भी विचार करती है जो बिना पूछे भी दुआओं का जवाब देती है, और प्रिय को दुश्मन मानने के अकल्पनीय विचार पर चिंतन करती है, ऐसे विचारों को शर्मसार चाहत से उत्पन्न मानती है।
गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
गर ख़ामुशी से फ़ाएदा इख़्फ़ा-ए-हाल है
ख़ुश हूँ कि मेरी बात समझनी मुहाल है
यदि ख़ामोशी का लाभ अपनी स्थिति को छुपाना है, तो मैं खुश हूँ कि मेरी बात को समझना कठिन है।
2
किस को सुनाऊँ हसरत-ए-इज़हार का गिला
दिल फ़र्द-ए-जमा-ओ-ख़र्च ज़बाँ-हा-ए-लाल है
मैं अपनी अभिव्यक्ति की हसरत का शिकवा किसे सुनाऊँ? मेरा दिल ही लाल ज़बानों के जमा-खर्च का खाता है।
3
किस पर्दे में है आइना-पर्दाज़ ऐ ख़ुदा
रहमत कि उज़्र-ख़्वाह-ए-लब-ए-बे-सवाल है
ऐ ख़ुदा, वह आइना-पर्दाज़ (दर्पण सजाने वाला) किस परदे में है? यह वह रहमत है जो उन होठों के लिए क्षमा याचना करती है जिनसे कोई सवाल नहीं उठा।
4
है है ख़ुदा-न-ख़्वास्ता वो और दुश्मनी
ऐ शौक़-ए-मुन्फ़इल ये तुझे क्या ख़याल है
हाय हाय, खुदा न करे, वो और दुश्मनी! ऐ शर्मिंदा आरज़ू, यह तुझे कैसा ख़याल आ गया है?
5
मुश्कीं लिबास-ए-काबा अली के क़दम से जान
नाफ़-ए-ज़मीन है न कि नाफ़-ए-ग़ज़ाल है
जानो कि काबा का मुश्क-रंग लिबास अली के क़दम की वजह से धरती की नाभि है, न कि किसी हिरण की नाभि।
6
वहशत पे मेरी अरसा-ए-आफ़ाक़ तंग था
दरिया ज़मीन को अरक़-ए-इंफ़िआ'ल है
मेरी वहशत के कारण दुनिया की विशालता भी तंग महसूस होती थी। दरिया ज़मीन के लिए शर्म का पसीना है।
7
हस्ती के मत फ़रेब में आ जाइयो 'असद'
आलम तमाम हल्क़ा-ए-दाम-ए-ख़याल है
हे 'असद', इस दुनियावी हस्ती (अस्तित्व) के धोखे में मत पड़ना। यह सारा संसार तो केवल कल्पना के जाल का एक घेरा मात्र है।
8
पहलू-तही न कर ग़म-ओ-अंदोह से 'असद'
दिल वक़्फ़-ए-दर्द कर कि फ़क़ीरों का माल है
ऐ असद, दुःख और गहरे निराशा से दूर मत हो। अपने दिल को दर्द के लिए समर्पित कर दो, क्योंकि यह फ़कीरों का धन है।
Comments
Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.
No comments yet.
