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गुल ग़ुन्चग़ी में ग़र्क़ा-ए-दरिया-ए-रंग है
ऐ आगही फ़रेब-ए-तमाशा कहाँ नहीं

The bud is drowned in a river of hues, even in its nascent bloom;Oh awareness, where does not the spectacle's illusion loom?

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

कली अपनी शुरुआती अवस्था में ही रंगों के दरिया में डूबी हुई है। हे चेतना, दिखावे का फरेब हर जगह मौजूद है।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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