ग़ज़ल
का'बा में जा रहा तो न दो ता'ना क्या कहें
کعبہ میں جا رہا تو نہ دو طعنہ کیا کہیں
यह ग़ज़ल ग़ालिब के गहन भाग्यवाद को दर्शाती है, जहाँ कवि महसूस करता है कि उसका भाग्य पूर्व-निर्धारित और त्रुटिपूर्ण है, जो उसे सदाचारी मार्गों से दूर ले जाता है। वह स्वर्ग की लालसा से प्रेरित उपासना की ईमानदारी और अटल भाग्य के सामने मानवीय प्रयासों की निरर्थकता पर सवाल उठाता है, यह सुझाव देते हुए कि व्यक्ति के प्रयास हमेशा विनाश के अधीन हैं।
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1
का'बा में जा रहा तो न दो ता'ना क्या कहें
भूला हूँ हक़्क़-ए-सोहबत-ए-अहल-ए-कुनिश्त को
शायर काबा जा रहा है, और पूछता है कि उसे ताना क्यों दिया जाए; वह स्वीकार करता है कि वह गिरजाघर के लोगों की संगति भूल गया है।
2
ता'अत में ता रहे न मय-ओ-अंगबीं की लाग
दोज़ख़ में डाल दो कोई ले कर बहिश्त को
ताकि इबादत में मय और अंगबीं की लालच न रहे, कोई बहिश्त को लेकर दोज़ख़ में डाल दे।
3
हूँ मुन्हरिफ़ न क्यूँ रह-ओ-रस्म-ए-सवाब से
टेढ़ा लगा है क़त क़लम-ए-सरनविश्त को
मैं सही मार्ग और रीति-रिवाज़ से क्यों न भटकूँ? क्योंकि भाग्य की कलम ने ही मेरी तकदीर को टेढ़ा लिखा है।
4
'ग़ालिब' कुछ अपनी स'ई से लहना नहीं मुझे
ख़िर्मन जले अगर न मलख़ खाए किश्त को
गालिब कहते हैं कि मुझे अपने प्रयासों से कुछ नहीं मिलेगा। अगर टिड्डियां फसल को न भी खाएं, तब भी खलिहान जल जाएगा।
5
आई अगर बला तो जगह से टले नहीं
ईरा ही दे के हम ने बचाया है किश्त को
अगर मुसीबत आई तो हम अपनी जगह से नहीं हटे; एक प्यादा (ईरा) देकर हमने बाजी (किश्त) को बचाया।
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