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ग़ज़ल

कहूँ जो हाल तो कहते हो मुद्दआ' कहिए

کہوں جو حال تو کہتے ہو مدعا کہیے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 11 shers· radif: कहिए

यह ग़ज़ल प्रेमी की गहरी भक्ति और महबूब के कार्यों को स्वीकार करने को दर्शाती है, भले ही वे दर्द या गलतफहमी पैदा करें। प्रेमी अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए हताशा व्यक्त करता है, जब उससे 'मकसद' पूछा जाता है। ताने और कठोरता के बावजूद, प्रेमी अधीन रहता है, यहाँ तक कि महबूब की तीखी नज़र और गहरे ज़ख़्मों को भी अंतरंग संबंध के स्रोत के रूप में संजोता है।

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1
कहूँ जो हाल तो कहते हो मुद्दआ' कहिए तुम्हीं कहो कि जो तुम यूँ कहो तो क्या कहिए
जब मैं अपनी स्थिति बताता हूँ, तो आप कहते हैं कि अपना इरादा बताएं। आप ही बताएँ कि यदि आप ऐसा कहते हैं, तो मुझे क्या कहना चाहिए?
2
कहियो ता' से फिर तुम कि हम सितमगर हैं मुझे तो ख़ू है कि जो कुछ कहो बजा कहिए
फिर तुम ताने से यह न कहना कि हम ज़ालिम हैं। मेरी तो आदत ही ऐसी है कि जो कुछ भी तुम कहो, मैं उसे सही मान लेता हूँ।
3
वो नेश्तर सही पर दिल में जब उतर जावे निगाह-ए-नाज़ को फिर क्यूँ आश्ना कहिए
वह भले ही एक नेश्तर हो, पर जब वह दिल में उतर जाए, तो उस नाज़ भरी निगाह को अपना परिचित क्यों न मानें?
4
नहीं ज़रीया-ए-राहत जराहत-ए-पैकाँ वो ज़ख़्म-ए-तेग़ है जिस को कि दिल-कुशा कहिए
तीर का घाव आराम का साधन नहीं होता। वह तो तलवार का ज़ख़्म है जिसे दिल को खुश करने वाला कहा जाए।
5
जो मुद्दई' बने उस के मुद्दई' बनिए जो ना-सज़ा कहे उस को ना-सज़ा कहिए
जो आपका विरोधी बने, उसके विरोधी न बनिए; जो आपको बुरा-भला कहे, उसे बुरा-भला न कहिए।
6
कहीं हक़ीक़त-ए-जाँ-काही-ए-मरज़ लिखिए कहीं मुसीबत-ए-ना-साज़ी-ए-दवा कहिए
कहीं जानलेवा बीमारी की सच्चाई को लिखें, और कहीं दवा के बेअसर होने की समस्या को बताएं।
7
कभी शिकायत-ए-रंज-ए-गिराँ-नशीं कीजे कभी हिकायत-ए-सब्र-ए-गुरेज़-पा कहिए
कभी गहरे बैठे दुख की शिकायत कीजिए। कभी उस सब्र की कहानी कहिए जो पल भर में भाग जाता है।
8
रहे जान तो क़ातिल को ख़ूँ-बहा दीजे कटे ज़बान तो ख़ंजर को मर्हबा कहिए
यदि जान न रहे तो हत्यारे को ख़ून-बहा दीजिए; यदि ज़बान कट जाए तो ख़ंजर का स्वागत कीजिए।
9
नहीं निगार को उल्फ़त हो निगार तो है रवानी-ए-रविश मस्ती-ए-अदा कहिए
मेरी प्रेमिका को शायद प्रेम न हो, लेकिन वह प्रेमिका तो है ही। उसकी चाल की सहजता और अदा की मादकता का वर्णन कीजिए।
10
नहीं बहार को फ़ुर्सत हो बहार तो है तरावत-ए-चमन ख़ूबी-ए-हवा कहिए
बसंत को फ़ुर्सत नहीं मिलती, या अगर बसंत का मौसम न भी हो, तो भी उसकी उपस्थिति है। इसे बाग़ की ताज़गी और हवा की सुंदरता कहिए।
11
सफ़ीना जब कि किनारे पे लगा 'ग़ालिब' ख़ुदा से क्या सितम-ओ-जौर-ए-ना-ख़ुदा कहिए
ग़ालिब, जब सफ़ीना किनारे पर आ ही लगा है, तो नाख़ुदा के ज़ुल्म और सितम की शिकायत ख़ुदा से क्या करें? इस शेर का अर्थ है कि जब मंज़िल मिल जाए, तो मार्गदर्शक की पिछली कठिनाइयों की शिकायत करना व्यर्थ है।
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