ग़ज़ल
मस्जिद के ज़ेर-ए-साया ख़राबात चाहिए
مسجد کے زیرِ سایہ خرابات چاہیے
यह ग़ज़ल प्रेम और लालसा की जटिलताओं को व्यक्त करती है, जहाँ पवित्र और लौकिक इच्छाएँ एक साथ दिखती हैं। शायर माशूक़ की सुंदरता को अपनी इबादत का केंद्र बनाता है, लेकिन साथ ही उसके बेवफ़ाई पर अफ़सोस भी करता है और अपने दुखी दिल के लिए इंसाफ़ की उम्मीद रखता है। यह कला को माशूक़ से मिलने का बहाना बनाने और तक़दीर की ज़्यादतियों से राहत पाने की इच्छा को भी दर्शाती है।
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1
मस्जिद के ज़ेर-ए-साया ख़राबात चाहिए
भौं पास आँख क़िबला-ए-हाजात चाहिए
मस्जिद की छाँव के नीचे मयखाने चाहिएँ। भौंह के पास की आँख सभी इच्छाओं का क़िबला होनी चाहिए।
2
आशिक़ हुए हैं आप भी एक और शख़्स पर
आख़िर सितम की कुछ तो मुकाफ़ात चाहिए
आप भी किसी और व्यक्ति पर आशिक़ हो गए हैं। आख़िरकार, आपके द्वारा किए गए सितम का कुछ तो बदला मिलना चाहिए।
3
दे दाद ऐ फ़लक दिल-ए-हसरत-परस्त की
हाँ कुछ न कुछ तलाफ़ी-ए-माफ़ात चाहिए
हे आकाश, इस लालसा से भरे हृदय को न्याय दे। हाँ, जो कुछ खो गया है, उसकी कुछ न कुछ भरपाई अवश्य होनी चाहिए।
4
सीखे हैं मह-रुख़ों के लिए हम मुसव्वरी
तक़रीब कुछ तो बहर-ए-मुलाक़ात चाहिए
हमने सुंदर मुख वाले प्रियजनों के लिए चित्रकारी सीखी है। आखिर, उनसे मुलाकात के लिए कोई बहाना तो चाहिए।
5
मय से ग़रज़ नशात है किस रू-सियाह को
इक-गूना बे-ख़ुदी मुझे दिन रात चाहिए
कवि पूछता है कि कौन ऐसा अभागा है जो शराब से सिर्फ़ ऊपरी खुशी चाहता है। मुझे तो दिन-रात एक ख़ास तरह की आत्म-विस्मृति या बेखुदी चाहिए।
6
है रंग-ए-लाला-ओ-गुल-ओ-नसरीं जुदा जुदा
हर रंग में बहार का इसबात चाहिए
ट्यूलिप, गुलाब और चमेली के रंग अलग-अलग होते हैं। फिर भी, हर रंग में बसंत की पुष्टि होनी चाहिए।
7
सर पा-ए-ख़ुम पे चाहिए हंगाम-ए-बे-ख़ुदी
रू सू-ए-क़िबला वक़्त-ए-मुनाजात चाहिए
बेखुदी के क्षणों में सर शराब के घड़े के पाँव पर होना चाहिए। और दुआ मांगने के समय चेहरा क़िबले की ओर होना चाहिए।
8
या'नी ब-हस्ब-ए-गर्दिश-ए-पैमान-ए-सिफ़ात
आरिफ़ हमेशा मस्त-ए-मय-ए-ज़ात चाहिए
अर्थात, गुणों के प्याले के घूमने के अनुसार, ज्ञानी को हमेशा ईश्वरीय सार की शराब से मस्त रहना चाहिए।
9
नश्व-ओ-नुमा है अस्ल से 'ग़ालिब' फ़ुरूअ' को
ख़ामोशी ही से निकले है जो बात चाहिए
ऐ ग़ालिब, शाखाओं को उनकी वृद्धि जड़ से मिलती है। जो बात चाहिए वह केवल ख़ामोशी से ही निकलती है।
10
वो बात चाहते हो कि जो बात चाहिए
साहब के हम-नशीं को करामात चाहिए
आप वही बात चाहते हैं जो उचित और सही है, लेकिन साहब के साथी को तो चमत्कार चाहिए। यह दर्शाता है कि जहाँ आप सामान्य और सही की अपेक्षा रखते हैं, वहीं सत्ता से जुड़े लोगों को असाधारण कामों की ज़रूरत पड़ती है।
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