नहीं गर ब-काम-ए-दिल-ए-ख़स्ता गर्दूं जिगर-ख़ाई-ए-जोश-ए-हसरत सलामत

“If fate turns not to grant my wounded heart's desire, so be it—long live the soul-gnawing torment of unfulfilled yearning!”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

अगर आसमान (क़िस्मत) मेरे दुखी दिल की ख़्वाहिश के मुताबिक़ नहीं चलता, तो न सही; अधूरी हसरतों के जोश में दिल-ओ-जिगर का लहूलुहान होना ही सलामत रहे।

विस्तार

इस शे'र में शायर मुक़द्दर की बेरुख़ी के सामने भी सर झुकाने के बजाय एक अनोखी ख़ुद्दारी दिखाता है। वो कहता है कि अगर यह ज़माना मेरे टूटे हुए दिल की मुराद पूरी नहीं करता, तो न सही—कम से कम मेरे सीने में सुलगती हसरतों और उनके मीठे दर्द की आग तो सलामत है! यहाँ 'जिगर-ख़ाई' यानी रूह को कुरेदने वाली तड़प को भी ज़िंदगी की निशानी और अपनी शान समझकर गले लगाया गया है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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