ग़ज़ल
रहा गर कोई ता-क़यामत सलामत
رہا گر کوئی تا قیامت سلامت
इस ग़ज़ल में जीवन की नश्वरता और मृत्यु की अनिवार्यता पर दार्शनिक और व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण से विचार किया गया है, जहाँ क़यामत तक की ज़िंदगी भी अंततः मौत से नहीं बच सकती। इसके साथ ही शायर प्रेम में मिलने वाले असीम दर्द, जिगर के ज़ख़्मों और आशिक़ की तड़प को बड़ी गहराई से प्रस्तुत करता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
रहा गर कोई ता-क़यामत सलामत
फिर इक रोज़ मरना है हज़रत-सलामत
अगर कोई क़यामत के दिन तक भी सही-सलामत ज़िंदा रह जाए, तब भी ऐ मोहतरम, आख़िरकार एक दिन तो मरना ही है।
2
जिगर को मिरे इश्क़-ए-खूँ-नाबा-मशरब
लिखे है ख़ुदावंद-ए-नेमत सलामत
ख़ून पीने वाला इश्क़ मेरे जिगर को अपना अन्नदाता मानते हुए अर्ज़ी लिखता है कि हे नेमतें देने वाले मेरे मालिक, आप सलामत रहें।
3
अलर्रग़्म-ए-दुश्मन शहीद-ए-वफ़ा हूँ
मुबारक मुबारक सलामत सलामत
मैं दुश्मन की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ वफ़ा की राह में शहीद हो गया हूँ, इसलिए मुझे बधाई हो और यह रुतबा हमेशा सलामत रहे।
4
नहीं गर सर-ओ-बर्ग-ए-इदराक-ए-मानी
तमाशा-ए-नैरंग-ए-सूरत सलामत
यदि आंतरिक अर्थ और वास्तविकता को समझने का सामर्थ्य नहीं है, तो बाहरी रूपों का रंग-बिरंगा तमाशा ही सलामत रहे।
5
दो-आलम की हस्ती पे ख़त्त-ए-फ़ना खींच
दिल-ओ-दस्त-ए-अरबाब-ए-हिम्मत सलामत
दोनों जहानों के अस्तित्व पर मिट जाने की लकीर खींच दो, बस हिम्मत और हौसले वाले लोगों का दिल और हाथ सलामत रहे।
6
नहीं गर ब-काम-ए-दिल-ए-ख़स्ता गर्दूं
जिगर-ख़ाई-ए-जोश-ए-हसरत सलामत
अगर आसमान (क़िस्मत) मेरे दुखी दिल की ख़्वाहिश के मुताबिक़ नहीं चलता, तो न सही; अधूरी हसरतों के जोश में दिल-ओ-जिगर का लहूलुहान होना ही सलामत रहे।
7
न औरों की सुनता न कहता हूँ अपनी
सर-ए-ख़स्ता दुश्वार-ए-वहशत सलामत
मैं न दूसरों की बातें सुनता हूँ और न अपना हाल किसी से कहता हूँ; मेरा यह थका-हारा सिर और दीवानेपन की यह कठिन वहशत सलामत रहे।
8
वफ़ूर-ए-बला है हुजूम-ए-वफ़ा है
सलामत मलामत मलामत सलामत
यहाँ मुसीबतों की भरमार और वफ़ा का हुजूम है; ज़माने के ताने और लानत-मलामत हमेशा सलामत रहें।
9
न फ़िक्र-ए-सलामत न बीम-ए-मलामत
ज़े-ख़ुद-रफ़्तगी-हा-ए-हैरत सलामत
न तो अपनी सलामती की कोई फ़िक्र है और न ही लोगों के तानों या बदनामी का कोई डर; बस हैरानी के आलम में खुद को भूल जाने की यह बेखुदी सलामत रहे।
10
रहे 'ग़ालिब'-ए-ख़स्ता मग़्लूब-ए-गर्दूं
ये क्या बे-नियाज़ी है हज़रत-सलामत
क्या लाचार और दुखी ग़ालिब हमेशा तक़दीर और ज़माने से हारा हुआ ही रहे? ऐ हुज़ूर, आपकी यह कैसी बेपरवाही है?
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