न फ़िक्र-ए-सलामत न बीम-ए-मलामत ज़े-ख़ुद-रफ़्तगी-हा-ए-हैरत सलामत

“No care for safety, no dread of reproach; long live the ecstatic self-abandonment born of wonder!”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

न तो अपनी सलामती की कोई फ़िक्र है और न ही लोगों के तानों या बदनामी का कोई डर; बस हैरानी के आलम में खुद को भूल जाने की यह बेखुदी सलामत रहे।

विस्तार

यह शेर उस जादुई कैफ़ियत का जश्न मनाता है, जहाँ इंसान हैरत और इश्क़ में इस कदर डूब जाता है कि उसे अपनी सुध-बुध ही नहीं रहती। यहाँ न तो खुद को सलामत और महफ़ूज़ रखने की कोई फ़िक्र है, और न ही ज़माने की तोहमतों और तानों का कोई डर। शायर अपनी इस बेखुदी को दुआ दे रहा है, क्योंकि दुनियावी नफ़ा-नुकसान से परे जाकर किसी जमाल के सामने खुद को खो देना ही रूह की असली आज़ादी है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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