ग़ज़ल
शब ख़ुमार-ए-शौक़-ए-साक़ी रुस्तख़ेज़-अंदाज़ा था
شب خمارِ شوقِ ساقی رستاخیز اندازہ تھا
यह ग़ज़ल साक़ी के लिए एक असाधारण और प्रलयंकारी प्यास को दर्शाती है, जहाँ जुनून की एक क़दम कायनात के रहस्यों को खोल देती है। इसमें लैला-मजनूं के अटूट प्रेम की तरह बे-हद इश्क़ की बात की गई है, और ख़ूबसूरती के अंदाज़-ए-इस्तिग़ना पर भी टिप्पणी की गई है।
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1
शब ख़ुमार-ए-शौक़-ए-साक़ी रुस्तख़ेज़-अंदाज़ा था
ता-मुहीत-ए-बादा सूरत ख़ाना-ए-ख़म्याज़ा था
बीती रात, साक़ी की चाहत का नशा क़यामत के समान गहरा था। शराब का पूरा विस्तार एक अंतहीन जम्हाई के घर जैसा था, जो अत्यधिक और असीम थकान का संकेत था।
2
यक क़दम वहशत से दर्स-ए-दफ़्तर-ए-इम्काँ खुला
जादा अजज़ा-ए-दो-आलम दश्त का शीराज़ा था
एक कदम की वहशत से संभावनाओं की किताब का पाठ खुल गया। यह रास्ता दोनों जहानों के बिखरे हुए तत्वों से बना था, जो रेगिस्तान का ताना-बाना था।
3
माना-ए-वहशत-ख़िरामी-हा-ए-लैला कौन है
ख़ाना-ए-मजनून-ए-सहरा-गर्द बे-दरवाज़ा था
लैला की वहशत भरी चालों को कौन रोक सकता है? मजनू, जो सहरा में भटकता था, उसका घर तो बे-दरवाज़ा था, यानी कोई रुकावट नहीं थी।
4
पूछ मत रुस्वाई-ए-अंदाज़-ए-इस्तिग़ना-ए-हुस्न
दस्त मरहून-ए-हिना रुख़्सार रहन-ए-ग़ाज़ा था
हुस्न के बेपरवाह अंदाज़ की बदनामी के बारे में मत पूछो। उसके हाथ मेहंदी के कर्जदार थे और गाल गाजे (मेकअप) के रहन थे।
5
नाला-ए-दिल ने दिए औराक़-ए-लख़्त-ए-दिल ब-बाद
याद-गार-ए-नाला इक दीवान-ए-बे-शीराज़ा था
दिल की आह ने दिल के टुकड़ों के पन्नों को हवा में बिखेर दिया। उस आह की एकमात्र यादगार एक बिना बाइंडिंग का काव्य-संग्रह थी।
6
हूँ चराग़ान-ए-हवस जूँ काग़ज़-ए-आतिश-ज़दा
दाग़ गर्म-ए-कोशिश-ए-ईजाद-ए-दाग़-ए-ताज़ा था
मैं जलते हुए कागज़ के समान इच्छाओं का एक चराग़ान हूँ। मेरे दाग़ (निशान) नए दाग़ बनाने की कोशिश में गर्म थे।
7
बे-नवाई तर सदा-ए-नग़्मा-ए-शोहरत 'असद'
बोरिया यक नीस्ताँ-आलम बुलंद आवाज़ा था
ऐ असद, मेरी ख़ामोशी शोहरत के गीत की आवाज़ से ज़्यादा असरदार है; मेरी मामूली चटाई की आवाज़ एक पूरे नरकुल के जंगल की तरह बुलंद थी।
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