माना-ए-वहशत-ख़िरामी-हा-ए-लैला कौन है
ख़ाना-ए-मजनून-ए-सहरा-गर्द बे-दरवाज़ा था
“Who can restrain the wildness of Laila's stride?Majnun, the desert-wanderer, had no door to hide.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
लैला की वहशत भरी चालों को कौन रोक सकता है? मजनू, जो सहरा में भटकता था, उसका घर तो बे-दरवाज़ा था, यानी कोई रुकावट नहीं थी।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
