Sukhan AI
ग़ज़ल

मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है

मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है

यह ग़ज़ल बताती है कि मकतबों (ज्ञान के स्थानों) में न केवल ज्ञान की भव्यता है, बल्कि रहस्यमय और आध्यात्मिक आनंद भी है। यह राह-ए-रवाँ (जीवन के मार्ग) पर मंज़िल दूर और कठिन ज़रूर है, लेकिन इस सफ़र में ऐसे साथी और मार्गदर्शक भी मौजूद हैं। यह कविता बताती है कि धर्म और वतन के लिए संघर्ष का समय है, और ऐसे लोग हैं जो साहस और वीरता के प्रतीक हैं, साथ ही मोमिन के लिए ज्ञान की सीमा से परे आनंद और दर्शन का सुख भी है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है ख़ानक़ाहों में कहीं लज़्ज़त-ए-असरार भी है
मकतबों में विचारों की भव्यता है, और ख़ानक़ाहों में रहस्यों का आनंद है।
2
मंज़िल-ए-राह-रवाँ दूर भी दुश्वार भी है कोई इस क़ाफ़िले में क़ाफ़िला-सालार भी है
राह की मंजिल, चाहे वह दूर हो या कठिन, निश्चित रूप से है; इस कारवां में कोई ऐसा भी है जो स्वयं एक कारवां का नेतृत्व करने वाला है।
3
बढ़ के ख़ैबर से है ये मारका-ए-दीन-ओ-वतन इस ज़माने में कोई हैदर-ए-कर्रार भी है
खैबर से यह धर्म और वतन पर हमला इतना बढ़ गया है कि इस ज़माने में कोई बहादुर और साहसी व्यक्ति नहीं है।
4
इल्म की हद से परे बंदा-ए-मोमिन के लिए लज़्ज़त-ए-शौक़ भी है नेमत-ए-दीदार भी है
ज्ञान की सीमा से परे, एक मोमिन (आस्थावान) के लिए, प्रेम की मिठास भी एक कृपा है और दर्शन का सौभाग्य भी एक वरदान है।
5
पीर-ए-मय-ख़ाना ये कहता है कि ऐवान-ए-फ़रंग सुस्त-बुनियाद भी है आईना-दीवार भी है
पीर-ए-मय-ख़ाना कहता है कि विदेशी शैली का ऐवान भी तो एक कमजोर नींव वाला आईना-दीवार मात्र है।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.