Sukhan AI
ग़ज़ल

तुझे याद क्या नहीं है मिरे दिल का वो ज़माना

तुझे याद क्या नहीं है मिरे दिल का वो ज़माना

यह ग़ज़ल प्रियतम के ज़माने और यादों की महत्ता को दर्शाती है। शायर कहता है कि मेरे दिल का वो ज़माना तुझे याद न हो, यह कैसे संभव है। इसमें मोहब्बत की यादें, अतीत का सौंदर्य और वर्तमान के बदलते माहौल में एक विशेष जुड़ाव महसूस किया गया है।

गाने लोड हो रहे हैं…
00
1
तुझे याद क्या नहीं है मिरे दिल का वो ज़माना वो अदब-गह-ए-मोहब्बत वो निगह का ताज़ियाना
तुझे याद क्या नहीं है मेरे दिल का वो ज़माना, वह मोहब्बत का दरबार और वह नज़रों का ताज़ियाना।
2
ये बुतान-ए-अस्र-ए-हाज़िर कि बने हैं मदरसे में न अदा-ए-काफ़िराना न तराश-ए-आज़राना
ये आज के ज़माने के बुतान (शैक्षणिक संस्थान) हैं जो मदरसों में बने हैं, न इसमें काफ़िराना अदा है और न ही आज़राना तर्ज़।
3
नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त ये जहाँ अजब जहाँ है न क़फ़स न आशियाना
इस खुली हवा में आराम करने के लिए कोई कोना नहीं है। यह दुनिया अजीब है, न पिंजरा है और न ही घोंसला।
4
रग-ए-ताक मुंतज़िर है तिरी बारिश-ए-करम की कि अजम के मय-कदों में न रही मय-ए-मुग़ाना
मेरे दिल की नस तुम्हारे कृपा के वर्षा की प्रतीक्षा कर रही है, क्योंकि अजब के मदिरा पात्रों में गायक का मदिरा समाप्त हो गया है।
5
मिरे हम-सफ़ीर इसे भी असर-ए-बहार समझे उन्हें क्या ख़बर कि क्या है ये नवा-ए-आशिक़ाना
मेरे हमसफ़र इसे भी बस बहार का असर समझ बैठे, उन्हें क्या ख़बर कि ये तो आशिक़ाना नया नज़्म है।
6
मिरे ख़ाक ओ ख़ूँ से तू ने ये जहाँ किया है पैदा सिला-ए-शाहिद क्या है तब-ओ-ताब-ए-जावेदाना
मेरे खाक और खून से तूने यह जहाँ पैदा किया है; सिला-ए-शाहिद क्या है तब-ओ-ताब-ए-जावेदाना।
7
तिरी बंदा-परवरी से मिरे दिन गुज़र रहे हैं न गिला है दोस्तों का न शिकायत-ए-ज़माना
तुम्हारी सुंदरता की चिंता में मेरे दिन बीत रहे हैं। न दोस्तों से कोई शिकायत है और न ही दुनिया से कोई शिकायत।
Comments

Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.

0

No comments yet.