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ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी
न छूटे मुझ से लंदन में भी आदाब-ए-सहर-ख़ेज़ी

In the zemin's wind, the saber's swiftness roared, Let not my manners, even in London, be ignored.

अल्लामा इक़बाल
अर्थ

ज़मीनी हवा में तलवार की तेज़ी गूँज रही थी, और लंदन में भी मेरे शिष्टाचार का मान न छूटे।

विस्तार

यह शेर एक ज़बरदस्त हौसले की बात करता है। शायर कहते हैं कि ज़िंदगी में कितनी भी मुश्किलें आएं.... कितनी भी हवा में तलवार की तेज़ी क्यों न हो... लेकिन जो चीज़ हमारी पहचान है, हमारा हुनर है, वो कभी नहीं छूटना चाहिए। लंदन में भी, अपने आदाब-ए-सहर-ख़ेज़ी को बचाए रखना, यही असली जंग है!

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