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ग़ज़ल

ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी

ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी

यह ग़ज़ल एक तेज़, जोश भरी और सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल से भरी कहानी बयान करती है, जिसमें व्यक्तिगत कौशल और सामाजिक व्यवस्था के बदलते स्वरूप का चित्रण है। यह महफ़िल की रौनक से लेकर ज़माने की बदलती ताकतों और सत्ता के बदलाव पर सवाल उठाती है, जिसमें अंत में यह कहा गया है कि चाहे जलाल-ए-पादशाही हो या जम्हूरी तमाशा, सियासत से अलग होकर भी एक शाश्वत सत्य शेष रहता है।

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1
ज़मिस्तानी हवा में गरचे थी शमशीर की तेज़ी न छूटे मुझ से लंदन में भी आदाब-ए-सहर-ख़ेज़ी
ज़मीनी हवा में तलवार की तेज़ी गूँज रही थी, और लंदन में भी मेरे शिष्टाचार का मान न छूटे।
2
कहीं सरमाया-ए-महफ़िल थी मेरी गर्म-गुफ़्तारी कहीं सब को परेशाँ कर गई मेरी कम-आमेज़ी
कभी-कभी मेरी गर्मजोशी भरी बातें महफ़िल का सरमाया थीं, और कभी-कभी मेरी अनुपस्थिति सब को परेशान कर गई।
3
ज़माम-ए-कार अगर मज़दूर के हाथों में हो फिर क्या तरीक़-ए-कोहकन में भी वही हीले हैं परवेज़ी
अगर कारीगरी के औज़ार मज़दूर के हाथों में हैं, तो फिर क्या महबूब के रास्ते में भी वही हीलें हैं परवेज़ी।
4
जलाल-ए-पादशाही हो कि जम्हूरी तमाशा हो जुदा हो दीं सियासत से तो रह जाती है चंगेज़ी
जलाल-ए-पादशाही हो या जम्हूरी तमाशा, अगर इसे सियासत से अलग किया जाए, तो यह चंगेज़ी ही रह जाता है।
5
सवाद-ए-रौमत-उल-कुबरा में दिल्ली याद आती है वही इबरत वही अज़्मत वही शान-ए-दिल-आवेज़ी
सवाद-ए-रौमत-उल-कुबरा की सुगंध में दिल्ली याद आती है; वही गौरव, वही महानता, वही दिल का अभिमान याद आता है।
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