છતાં માગ્યાની જીભ નવ ઊપડી રે
નવ ઊપડી રે – હરિ૦
“Yet the tongue for asking did not rise,Oh, it did not rise, oh Hari.”
— ज़वेરचंद मेघानी
अर्थ
फिर भी, मांगने के लिए ज़ुबान नहीं उठ पाई। हे हरि, वह नहीं उठ पाई।
विस्तार
यह पंक्ति भक्ति या गहरी विनम्रता के एक पल को खूबसूरती से दर्शाती है। भले ही कुछ मांगने की इच्छा या आवश्यकता रही हो, फिर भी जुबान से शब्द नहीं निकल पाए। यह एक ऐसी स्थिति का सुझाव देती है जहाँ हृदय इतना भरा हुआ है, या विश्वास इतना पूर्ण है, कि मौखिक अनुरोध अनावश्यक लगते हैं। यह एक मौन, अनकही स्वीकृति के बारे में है, जहाँ किसी की ज़रूरतें महसूस की जाती हैं लेकिन बोली नहीं जातीं, शायद इसलिए क्योंकि भक्ति, सम्मान, या यह विश्वास कि सब कुछ पहले से ही ज्ञात और प्रदान किया गया है।
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