Sukhan AI
हरि संगत शीतल भया , मिटी मोह की ताप। निशिवासर सुख निधि , लहा अन्न प्रगटा आप॥ 136॥

The company of Hari is cool, it diminishes the heat of attachment. The abode of bliss, which appears naturally, is the day and night.

कबीर
अर्थ

हरि की संगति से मोह का ताप शीतल हो जाता है। यह सुख का भंडार दिन और रात में स्वयं प्रकट हो जाता है।

विस्तार

कबीर दास जी कहते हैं कि जब हम हरि (ईश्वर) की संगति में होते हैं, तो हमारा मन एकदम शांत और शीतल हो जाता है, जैसे तपती धूप में ठंडी हवा का झोंका मिल जाए। इससे हमारे भीतर का मोह और सांसारिक इच्छाओं की गर्मी शांत हो जाती है। वे समझाते हैं कि सच्चा सुख या आनंद कहीं दूर नहीं, बल्कि दिन-रात, हर पल हमारे भीतर ही मौजूद है और अपने आप प्रकट होता रहता है, बस हमें उसे महसूस करना है।

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पाठ
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