ग़ज़ल
कबीर 131-140
کبیر 131-140
कबीर के ये दोहे शरीर की क्षणभंगुरता और व्यर्थ के मोह से बचने का संदेश देते हैं। वे एकत्व के आध्यात्मिक सत्य को बताते हैं कि कैसे अनंत एक ही स्रोत से उत्पन्न होता है और उसी में विलीन हो जाता है। ये साधुओं और वीरों की गहन निष्ठा की भी सराहना करते हैं जो शारीरिक इच्छाओं से ऊपर उठकर उच्च मार्ग अपनाते हैं।
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1
कांचे भाडें से रहे , ज्यों कुम्हार का देह। भीतर से रक्षा करे , बाहर चोई देह॥ 131॥
कांच की भाड़ें (घटें) कुम्हार के शरीर की तरह हैं। ये अंदर से रक्षा करती हैं और बाहर की गंदगी को साफ रखती हैं।
2
केतन दिन ऐसे गए , अन रुचे का नेह। अवसर बोवे उपजे नहीं , जो नहीं बरसे मेह॥ 133॥
कवि कहते हैं कि दिन इस प्रकार बीत गए, अनियंत्रित प्रेम के साथ। अवसर उन जगहों पर नहीं उगते जहाँ उन्हें बोया न गया हो, और न ही बारिश वहाँ होती है जहाँ उसे बुलाया न गया हो।
3
एक ते अनन्त अन्त एक हो जाय। एक से परचे भया , एक मोह समाय॥ 134॥
एक से अनंत तक, अंत में सब कुछ एक हो जाता है। एक से परचे (भ्रम) उत्पन्न होता है, और व्यक्ति मोह (अटैचमेंट) में उलझ जाता है।
4
साधु सती और सूरमा , इनकी बात अगाध। आशा छोड़े देह की , तन की अनथक साध॥ 135॥
साधु, सती और सूरमा—इनकी बातें गहरी हैं। शरीर की आशा छोड़कर, आत्मा का अथक साधना करना चाहिए।
5
हरि संगत शीतल भया , मिटी मोह की ताप। निशिवासर सुख निधि , लहा अन्न प्रगटा आप॥ 136॥
हरि की संगति से मोह का ताप शीतल हो जाता है। यह सुख का भंडार दिन और रात में स्वयं प्रकट हो जाता है।
6
आशा का ईंधन करो , मनशा करो बभूत। जोगी फेरी यों फिरो , तब वन आवे सूत॥ 137॥
आशा का ईंधन जलाओ, मन की इच्छाओं को खाद दो। ऐसे योगी की तरह विचरण करो, तब वन (जंगल) स्वयं प्रकट होगा।
7
आग जो लगी समुद्र में , धुआँ ना प्रकट होय। सो जाने जो जरमुआ , जाकी लाई होय॥ 138॥
समुद्र में लगी आग की तरह, जो धुआँ नहीं निकलती, वैसे ही जो जीवन जलकर समाप्त होता है, उसका कोई निशान नहीं रह जाता।
8
अटकी भाल शरीर में , तीर रहा है टूट। चुम्बक बिना निकले नहीं , कोटि पठन को फूट॥ 139॥
अटकी भाल शरीर में, मानो कोई तीर शरीर में टूटकर अटक गया हो। बिना चुंबक के, लाखों पाठों में भी उस चीज़ को निकालना संभव नहीं है।
9
अपने-अपने साख की , सब ही लीनी भान। हरि की बात दुरन्तरा , पूरी ना कहूँ जान॥ 140॥
अपने-अपने साख की, सब ही मात्र भ्रम हैं। हरि की बात तो इतनी गूढ़ है कि मैं उसे पूरी तरह कह नहीं सकता।
10
आस पराई राखता , खाया घर का खेत। और्न को पथ बोधता , मुख में डारे रेत॥ 141॥
पराया आस रखना, और घर का खेत खाना। अजनबी का मार्ग दिखाना, और मुँह में रेत डालना।
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