आशा का ईंधन करो , मनशा करो बभूत। जोगी फेरी यों फिरो , तब वन आवे सूत॥ 137॥
“Kindle the fuel of hope, nurture the desire. Wander like a sage, and then the forest will appear.”
— कबीर
अर्थ
आशा का ईंधन जलाओ, मन की इच्छाओं को खाद दो। ऐसे योगी की तरह विचरण करो, तब वन (जंगल) स्वयं प्रकट होगा।
विस्तार
कबीर साहब इस दोहे में बताते हैं कि सत्य की राह पर चलने के लिए हमें आशा को अपना ईंधन बनाना चाहिए। अपनी सांसारिक इच्छाओं को राख करके, एक जोगी की तरह निरंतर खोज में लगे रहना होगा, बिना किसी मोह के। यह आत्मिक यात्रा ही हमें भीतर से तैयार करती है, और तभी ज्ञान का वह घना 'वन' हमारे सामने खुलता है, जहाँ परम सत्य का मार्ग छिपा है।
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