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हर चाले तो मानव , बेहद चले सो साध। हद बेहद दोनों तजे , ताको भता अगाध॥ 46॥

When man walks, he is boundless; when the saint walks, he is deep. Leaving both bounds and depth, his greatness is profound.

कबीर
अर्थ

जब मनुष्य चलता है, तो वह सीमा से परे होता है; जब संत चलते हैं, तो वह गहराई से परे होता है। दोनों सीमाओं और गहराइयों को त्यागकर, उनका महत्व बहुत गहरा होता है।

विस्तार

कबीर दास जी कहते हैं कि सामान्य मनुष्य अपनी सीमाओं में चलता है। एक साधु उन सीमाओं को पार कर 'बेहद' हो जाता है। परंतु जो इन 'हद' (सीमाओं) और 'बेहद' (असीमता) दोनों को त्याग देता है, उसकी महानता truly अगाध (अथाह और गहन) होती है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची आध्यात्मिकता किसी एक अवस्था में बंधने की बजाय, सभी बंधनों से परे जाने में है।

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