ग़ज़ल
कबीर 421-430
کبیر 421-430
यह ग़ज़ल जीवन की नश्वरता पर प्रकाश डालती है, जिसमें बताया गया है कि जो कुछ भी उत्पन्न होता है, वह अंततः समाप्त हो जाता है। यह समता, निष्पक्षता और धैर्य के गुणों पर ज़ोर देती है, विशेषकर आध्यात्मिक साधकों के लिए। कबीर यह भी सुझाव देते हैं कि ज्ञान की सच्ची प्यास वाले व्यक्ति को उसे खोजने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, और अंततः स्वार्थ से बंधे मनुष्य के बीच केवल सृष्टिकर्ता ही सच्चा हितैषी है।
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1
जो ऊग्या सो आंथवै , फूल्या सो कुमिलाइ। जो चिणियां सो ढहि पड़ै , जो आया सो जाइ॥ 423॥
जो उगता है वह सूख जाता है, जो खिलता है वह मुरझा जाता है। जो दिखाई देता है वह गिर जाता है, और जो आता है वह चला जाता है।
2
सीतलता तब जाणियें , समिता रहै समाइ। पष छाँड़ै निरपष रहै , सबद न देष्या जाइ॥ 424॥
जब शीतलता का ज्ञान होता है, तो वह वातावरण में बनी रहती है। जब अग्नि चली जाती है, तो हवा शुद्ध बनी रहती है; इस अवस्था का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता।
3
खूंदन तौ धरती सहै , बाढ़ सहै बनराइ। कुसबद तौ हरिजन सहै , दूजै सह्या न जाइ॥ 425॥
अर्थात्, जिस प्रकार धरती सुगंध और बाढ़ दोनों को सहन करती है, उसी प्रकार कुसबद (प्रियतम) हरिजन (भक्त) को सहन करता है, जिसे कोई और सहन नहीं कर सकता।
4
नीर पियावत क्या फिरै , सायर घर-घर बारि। जो त्रिषावन्त होइगा , सो पीवेगा झखमारि॥ 426॥ कबीर सिरजन हार बिन , मेरा हित न कोइ। गुण औगुण बिहणै नहीं , स्वारथ बँधी लोइ॥ 427॥
शायर का क्या लाभ, अगर पानी मिले नहीं, और प्यासा व्यक्ति घाव से ही पीएगा। कबीर कहते हैं कि सिर का हार न होने पर कोई मेरा भला नहीं कर सकता, वे गुणगान नहीं करते, बल्कि स्वार्थ से मुझे बाँधते हैं।
5
हीरा परा बजार में , रहा छार लपिटाइ। ब तक मूरख चलि गये पारखि लिया उठाइ॥ 428॥
हीरे के बाज़ार में, एक नींबू मिल गया। मूर्ख व्यक्ति वहाँ से गुज़र गया, और उसे देखकर वह उठा लिया।
6
सुरति करौ मेरे साइयां , हम हैं भोजन माहिं। आपे ही बहि जाहिंगे , जौ नहिं पकरौ बाहिं॥ 429॥
हे मेरे भगवान, आप पर कृपा करें, क्योंकि हम मुसीबत में हैं। यदि आपने हमें नहीं बचाया, तो हम निश्चित रूप से नष्ट हो जाएंगे।
7
क्या मुख लै बिनती करौं , लाज आवत है मोहि। तुम देखत ओगुन करौं , कैसे भावों तोहि॥ 430॥
मैं अपना मुख लेकर क्या विनती करूँ, मुझे लाज आ रही है। तुम मुझे देखकर क्या विनती करूँ, मेरे भावों को तुम्हें कैसे समझाऊँ।
8
सब काहू का लीजिये , साचां सबद निहार। पच्छपात ना कीजिये कहै कबीर विचार॥ 431॥
सबके काहू का लीजिये, साचां सबद निहार। पच्छपात न कीजिये, कहै कबीर विचार। इसका अर्थ है कि आपको सभी को स्वीकार करना चाहिए और सच्चे शब्दों पर ध्यान देना चाहिए। कबीर कहते हैं कि किसी के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए।
9
गुरु सों ज्ञान जु लीजिये सीस दीजिए दान। बहुतक भोदूँ बहि गये , राखि जीव अभिमान॥ 432॥
गुरु से ज्ञान प्राप्त करें और अपना शीश (जीवन) दान में दे दें। बहुत कष्ट भोग लिए हैं, मेरे जीवन का अभिमान (आत्म-सम्मान) बचाए रखें।
10
गुरु को कीजै दण्डव कोटि-कोटि परनाम। कीट न जाने भृगं को , गुरु करले आप समान॥ 433॥
गुरु के लिए कोटि-कोटि प्रणाम अर्पित करें। कीड़ा भौंरे को नहीं जानता, वैसे ही गुरु का हाथ स्वयं के समान होता है।
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