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ग़ज़ल

कबीर संग्रह 51-60

کبیر سنگرہ 51-60
कबीर· Ghazal· 10 shers

यह ग़ज़ल कबीर के उपदेशों को दर्शाती है कि संसार अक्सर अमूल्य सत्यों से अनभिज्ञ रहता है और अच्छे कर्मों के बिना लोग भटकते रहते हैं। यह बताती है कि सच्ची भक्ति काम, क्रोध और लालच से परे है, जिसके लिए व्यक्ति को अपनी जाति, वर्ण और कुल का त्याग करना पड़ता है। यह निरंतर आध्यात्मिक जागरण और परमात्मा से अटूट जुड़ाव बनाए रखने का आग्रह करती है।

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1
वस्तु है ग्राहक नहीं , वस्तु सागर अनमोल। बिना करम का मानव , फिरैं डांवाडोल॥ 54॥
वस्तु का ग्राहक नहीं होता, वह स्वयं सागर के समान अनमोल है। बिना कर्म का मनुष्य जीवन में हमेशा अस्थिर और भटकता रहता है।
2
कली खोटा जग आंधरा , शब्द न माने कोय। चाहे कहँ सत आइना , जो जग बैरी होय॥ 55॥
कली कहता है कि यह जग खोटा और अंधकारमय है, जहाँ कोई भी शब्द नहीं मानता। भले ही सच्चा आईना दिखाया जाए, यह संसार शत्रु बना रहता है।
3
कामी , क्रोधी , लालची , इनसे भक्ति न होय। भक्ति करे कोइ सूरमा , जाति वरन कुल खोय॥ 56॥
कामी, क्रोधी और लालची स्वभाव से भक्ति नहीं होती। सच्चे और वीर लोग भक्ति करते हुए जाति, वर्ण और कुल का त्याग कर देते हैं।
4
जागन में सोवन करे , साधन में लौ लाय। सूरत डोर लागी रहे , तार टूट नाहिं जाय॥ 57॥
जागने की अवस्था में अपने प्रयास को जलाए रखें, और अपना मुख (या लक्ष्य) इस तरह रखें कि डोर न टूटे।
5
साधु ऐसा चहिए , जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहे , थोथ देइ उड़ाय॥ 58॥
ऐसा साधु चाहिए, जो सूप (छलनी) के समान हो; जो वस्तु का सार ग्रहण करे और तुच्छ बातों को उड़ा दे।
6
लगी लग्न छूटे नाहिं , जीभ चोंच जरि जाय। मीठा कहा अंगार में , जाहि चकोर चबाय॥ 59॥
यह बंधन बंध गया है और मुझसे छूटेगा नहीं; मेरी जीभ चोंच की तरह जल रही है। मीठी चीज़ों में अंगारे होते हैं; चकोर उन पर चबाता है।
7
भक्ति गेंद चौगान की , भावे कोई ले जाय। कह कबीर कुछ भेद नाहिं , कहां रंक कहां राय॥ 60॥
चौगान के मैदान की भक्ति ऐसी है कि कोई भी उसे ले जा सकता है। कबीर कहते हैं कि कोई रहस्य नहीं है, न ही कोई रंक है और न ही कोई राजा।
8
घट का परदा खोलकर , सन्मुख दे दीदार। बाल सनेही सांइयाँ , आवा अन्त का यार॥ 61॥
घट का परदा खोलकर, उसने सामने दीदार दिया। हे बाल सनेही सांइयाँ, तू ही अंतर का यार है।
9
अन्तर्यामी एक तुम , आत्मा के आधार। जो तुम छोड़ो हाथ तो , कौन उतारे पार॥ 62॥
अन्तर्यामी कहकर आप आत्मा का आधार बताया गया है; यदि आप यह हाथ छोड़ देंगे, तो कौन पार उतारेगा।
10
मैं अपराधी जन्म का , नख-सिख भरा विकार। तुम दाता दु:ख भंजना , मेरी करो सम्हार॥ 63॥
मैं जन्म से अपराधी हूँ और सिर से पैर तक विकारों से भरा हूँ। तुम दुखों का नाश करने वाले दाता हो, कृपया मेरी रक्षा करो।
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