“One's spilled pot will be refilled, another's filled pot spills,Here only sand keeps flying, so why complain about ills?”
किसी का खाली बर्तन भर जाता है तो किसी का भरा हुआ छलक जाता है; यहाँ तो बस रेत ही उड़ती रहती है। फिर भला किस बात की शिकायत है?
यह दोहा जीवन के उतार-चढ़ाव को बड़ी खूबसूरती से दर्शाता है। इसमें चीजों के भरने और फिर खाली होने, या खाली होकर फिर से भरने की बात कही गई है, जो जीवन में लाभ-हानि, निर्माण और विनाश के निरंतर चक्र का प्रतीक है। कवि आगे कहते हैं, "यहां तो रेत उड़ती है", जिसका अर्थ है कि इस दुनिया में सब कुछ क्षणभंगुर और अस्थायी है, ठीक उड़ती रेत की तरह। अस्तित्व की इस अंतर्निहित प्रकृति को देखते हुए – जहाँ चीजें आती-जाती हैं, उठती-गिरती हैं – प्रश्न "फिर शिकायत किस बात की है?" हमें जीवन की अप्रत्याशित यात्रा को शांति से स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है। यह सिखाता है कि परिवर्तन ही एकमात्र स्थिर सत्य है, और हमें इससे विरक्ति और संतोष प्राप्त करना चाहिए।
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