“Its very image fell into the waters, and seemed to soar,From this, a swan, in vain dread, flew from the shore.”
उसकी ही परछाई पानी में पड़ी और उड़ती हुई-सी लगी, इसी व्यर्थ के डर से हंस उड़ गया।
कल्पना कीजिए एक सुंदर हंस पानी पर तैर रहा है। उसने नीचे देखा और पानी की लहरों में एक छवि को हिलता हुआ पाया। उसे यह एहसास नहीं हुआ कि यह तो बस उसकी अपनी ही परछाई थी, जो पानी की हलचल से थोड़ी विकृत दिख रही थी। हंस ने इस जानी-पहचानी छवि को कोई अज्ञात जीव या शायद कोई और पक्षी समझ लिया जो उसकी ओर उड़ रहा था। एक अचानक, निराधार डर से घबराकर, हंस उड़ गया, खुद अपनी ही छवि से दूर चला गया। यह दोहा हमें धीरे से याद दिलाता है कि कैसे हम अक्सर अपनी ही धारणाओं या परिस्थितियों से बेवजह डर जाते हैं, उनकी हानिरहित प्रकृति को समझे बिना।
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