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शायद कि काम सुब्ह तक अपना खिंचे न 'मीर'
अहवाल आज शाम से दरहम बहुत है याँ

Perhaps tonight I won't be able to hold on until morning, O Mir, My condition is already too much of a burden this evening.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

शायद मेरा जीवन सुबह तक न खिंच पाए, मीर; आज शाम से ही यहाँ मेरी हालत बहुत खराब और अस्त-व्यस्त है।

विस्तार

यह शेर एक गहरी थकान और भावनात्मक बोझ को दर्शाता है। शायर कहते हैं कि हालात इतने भारी हो गए हैं कि अब सुबह तक अपना काम निपटा पाना मुश्किल है। ऐसा महसूस होता है जैसे समय और ज़िम्मेदारियाँ दोनों ही बहुत ज़्यादा हो गई हैं। यह सिर्फ़ किसी काम के न होने की बात नहीं है, बल्कि मन की उस हालत को बयान करना है, जहाँ इंसान बस थक चुका होता है और हार मान लेता है।

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