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ग़ज़ल

आ जाएँ हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ

आ जाएँ हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ

यह ग़ज़ल विरह की तीव्र भावना और प्रियतम के नज़दीक आने की उत्कंठा को व्यक्त करती है। शायर कहता है कि वे बस एक बार नज़र के सामने आ जाएँ, क्योंकि उन्हें विरह की पीड़ा से राहत की बहुत ज़रूरत है। यह प्रेम में वियोग और इंतज़ार के गहन भावों का वर्णन करती है।

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1
आ जाएँ हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ मोहलत हमें बिसान-ए-शरर कम बहुत है याँ
अगर हम यहाँ कुछ पल के लिए भी नज़र आ जाएँ तो बहुत है; यहाँ हमारे पास एक चिंगारी की तरह बहुत ही कम समय और मोहलत है।
2
यक लहज़ा सीना-कोबी से फ़ुर्सत हमें नहीं यानी कि दिल के जाने का मातम बहुत है याँ
मुझे सीना पीटने से एक पल की भी फुर्सत नहीं है। इसका अर्थ है कि यहाँ मेरे दिल के चले जाने का बहुत गहरा मातम मनाया जा रहा है।
3
हासिल है क्या सिवाए तराई के दहर में उठ आसमाँ तले से कि शबनम बहुत है याँ
इस दुनिया में नमी के सिवा और क्या रखा है? इस आसमान के नीचे से उठ जाओ क्योंकि यहाँ ओस यानी दुख के आँसू बहुत ज़्यादा हैं।
4
माइल-ब-ग़ैर होना तुझ अबरू का ऐब है थी ज़ोर ये कमाँ वले ख़म-चम बहुत है याँ
तुम्हारी भौहों का दूसरों की ओर झुकना एक दोष है। यह कमान शक्तिशाली तो थी, लेकिन इसमें घुमाव और नखरे बहुत अधिक हैं।
5
हम रह-रवान-ए-राह-ए-फ़ना देर रह चुके वक़्फ़ा बिसान-ए-सुब्ह कोई दम बहुत है याँ
हम मृत्यु के मार्ग के यात्री हैं और यहाँ बहुत समय बिता चुके हैं। हमारे लिए इस दुनिया में सुबह की ओस जैसा एक क्षण भर का ठहराव ही पर्याप्त है।
6
इस बुत-कदे में मअ'नी का किस से करें सवाल आदम नहीं है सूरत-ए-आदम बहुत है याँ
इस दुनिया रूपी बुतखाने में हम असलियत का सवाल किससे पूछें? यहाँ इंसान जैसी सूरत वाले तो बहुत हैं, पर सच्चा इंसान कोई नहीं है।
7
आलम में लोग मिलने की गों अब नहीं रहे हर-चंद ऐसा वैसा तो आलम बहुत है याँ
इस दुनिया में अब मिलने लायक सच्चे लोग नहीं रहे। हालाँकि यहाँ साधारण और दिखावटी लोगों की कोई कमी नहीं है, लेकिन वे गहरी शख्सियतें अब नहीं मिलतीं।
8
वैसा चमन से सादा निकलता नहीं कोई रंगीनी एक और ख़म-ओ-चम बहुत है याँ
दुनिया के इस बाग से कोई भी वैसा सीधा-सादा नहीं निकलता जैसा वह आया था। यहाँ बहुत सी रंगीनियाँ और टेढ़े-मेढ़े मोड़ हैं जो इंसान को बदल देते हैं।
9
एजाज़-ए-ईसवी से नहीं बहस इश्क़ में तेरी ही बात जान मुजस्सम बहुत है याँ
इश्क में ईसा मसीह के जीवन देने वाले चमत्कार की चर्चा की ज़रूरत नहीं है। यहाँ तुम्हारी बातें ही किसी बेजान शरीर में जान फूंकने के लिए काफी हैं।
10
मेरे हलाक करने का ग़म है अबस तुम्हें तुम शाद ज़िंदगानी करो ग़म बहुत है याँ
मेरी मौत का दुख मनाना तुम्हारे लिए व्यर्थ है। तुम्हें अपनी ज़िंदगी खुशी से जीनी चाहिए क्योंकि इस दुनिया में पहले से ही बहुत दुख है।
11
दिल मत लगा रुख़-ए-अरक़-आलूद यार से आईने को उठा कि ज़मीं नम बहुत है याँ
महबूब के पसीने से भरे चेहरे से दिल मत लगाओ। आईने को उठा लो क्योंकि यहाँ की ज़मीन बहुत नम है।
12
शायद कि काम सुब्ह तक अपना खिंचे न 'मीर' अहवाल आज शाम से दरहम बहुत है याँ
शायद मेरा जीवन सुबह तक न खिंच पाए, मीर; आज शाम से ही यहाँ मेरी हालत बहुत खराब और अस्त-व्यस्त है।
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