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ग़ज़ल

हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं

हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं

यह ग़ज़ल एक गहन समर्पण और पहचान का भाव व्यक्त करती है, जिसमें वक्ता यह मानता है कि वह केवल अपने प्रियजन (आप) को ही अपना अंतिम लक्ष्य या उद्देश्य जानता है। यह प्रेम में इतनी गहराई तक डूबा हुआ है कि वह दुनिया में किसी और अस्तित्व या ज़रूरत को महत्व नहीं देता।

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1
हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं अपने सिवाए किस को मौजूद जानते हैं
आप ही मेरे लक्ष्य हैं, और आपके सिवाए मैं किसी को अस्तित्व में नहीं जानता।
2
इज्ज़-ओ-नियाज़ अपना अपनी तरफ़ है सारा इस मुश्त-ए-ख़ाक को हम मस्जूद जानते हैं
आपका सारा मान-सम्मान और कृपा आप पर है, और मैं स्वयं को केवल धूल से ढका हुआ एक सेवक जानता हूँ।
3
सूरत-पज़ीर हम बिन हरगिज़ नहीं वे माने अहल-ए-नज़र हमीं को मा'बूद जानते हैं
सूरत के लोग, बिना हमारे कभी नहीं मानेंगे। नज़रों के लोग हमें पूज्य (माबूद) जानते हैं।
4
इश्क़ उन की अक़्ल को है जो मा-सिवा हमारे नाचीज़ जानते हैं ना-बूद जानते हैं
इश्क़ उन की अक़्ल को है जो मा-सिवा हमारे नाचीज़ जानते हैं ना-बूद जानते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है कि प्रेम उन लोगों के लिए है जिनका विवेक केवल हमें जानता है, जो न तो अपमान और न ही विनाश को जानते हैं।
5
अपनी ही सैर करने हम जल्वा-गर हुए थे इस रम्ज़ को व-लेकिन मादूद जानते हैं
अर्थात्, हम स्वयं के रास्ते पर भ्रमण करते हुए मदहोश हो गए थे, लेकिन प्रिय, हम इस छल को अच्छी तरह जानते हैं।
6
यारब कसे है नाक़ा हर ग़ुंचा इस चमन का राह-ए-वफ़ा को हम तो मसदूद जानते हैं
दोस्त, यह नहीं कि इस बाग का हर कली एक जाल है; हम तो जानते हैं कि वफ़ा का रास्ता बंद है।
7
ये ज़ुल्म-ए-बे-निहायत दुश्वार-तर कि ख़ूबाँ बद-वज़इयों को अपनी महमूद जानते हैं
ये ज़ुल्म इतने कठिन हैं कि ख़ूबसूरत (या प्रिय) भी इन्हें आसान मानते हैं।
8
क्या जाने दाब सोहबत अज़ ख़्वेश रफ़्तगाँ का मज्लिस में शैख़-साहिब कुछ कूद जानते हैं
क्या कोई जान पाए कि मन की इच्छाओं और घुमक्कड़ों के साथ का व्यवहार कैसा होगा; महफ़िल के मालिक को कुछ नृत्यों का ज्ञान है।
9
मर कर भी हाथ आवे तो 'मीर' मुफ़्त है वो जी के ज़ियान को भी हम सूद जानते हैं
मरकर भी हाथ आवे तो 'मीर' मुफ़्त है वो, क्योंकि हम जीवन के प्रकाश पर भी ब्याज जानते हैं।
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