ग़ज़ल

जो कहो तुम सो है बजा साहब

जो कहो तुम सो है बजा साहब

यह ग़ज़ल जीवन के अनुभवों और रिश्तों की जटिलताओं पर एक चिंतन है। यह बताती है कि बाहरी दिखावे और धारणाओं के बावजूद, हमारे आंतरिक अनुभव ही सच होते हैं। कवि ईश्वर से भी विनती करता है कि वह अपनी कृपा और रहममंदी का अनुभव कराए।

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1
जो कहो तुम सो है बजा साहब हम बुरे ही सही भला साहब
जो आप कहेंगे वह सच होगा, साहब। भले ही हम बुरे हैं, पर यह अच्छा होगा, साहब।
2
सादा-ज़ेहनी में नुक्ता-चीं थे तुम अब तो हैं हर्फ़-आशना साहब
सादे दिमाग में आप नुक्ता लगाने वाले थे, पर अब तो साहब, आप अक्षर से परिचित हो गए हैं।
3
दिया रहम टुक बुतों के तईं क्या किया हाए ये ख़ुदा साहब
न दिया रहम टुक बुतों के तईं, क्या किया हाए ये ख़ुदा साहब। इसका अर्थ है कि आपने गरीबों पर दया क्यों नहीं की? यह भगवान ने क्या किया।
4
बंदगी एक अपनी क्या कम है और कुछ तुम से कहिए क्या साहब
मेरी अपनी बंदगी में क्या कमी है, और साहब, आप मुझसे और क्या कहलवाना चाहते हैं।
5
मेहर-अफ़ज़ा है मुँह तुम्हारा ही कुछ ग़ज़ब तो नहीं हुआ साहब
आपका मुखड़ा बहुत मदहोश कर देने वाला है, क्या साहब के साथ कुछ अद्भुत हुआ है?
6
ख़त के फटने का तुम से क्या शिकवा अपने तालेअ' का ये लिखा साहब
पत्र फटने का तुमसे क्या शिकवा, यह तो अपने भाग्य का लिखा है साहब।
7
फिर गईं आँखें तुम आन फिरे देखा तुम को भी वाह-वा साहब
तुम्हारी आँखें जो चली गईं, वे वापस नहीं आएंगी। ओह, आपको देखकर मैंने 'वाह-वाह, साहब' कहा।
8
शौक़-ए-रुख़ याद-ए-लब ग़म-ए-दीदार जी में क्या क्या मिरे रहा साहब
शौक़-ए-रुख़ (चेहरे की चाहत), याद-ए-लब (होंठों की याद), और ग़म-ए-दीदार (देखने का दुःख) – मेरे अंदर क्या-क्या बचा है, ऐ साहब।
9
भूल जाना नहीं ग़ुलाम का ख़ूब याद ख़ातिर रहे मिरा साहब
मेरे मालिक, आप मेरे गुलाम के गुण भूलिएगा नहीं, क्योंकि मैं आपकी यादों में जीवित हूँ।
10
किन ने सुन शेर-ए-'मीर' ये कहा कहियो फिर हाए क्या कहा साहब
किसने शायर मीर से कहा कि आपने यह नहीं कहा। अरे, आपने क्या कहा, साहब, क्या कहा।
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