मंज़ूर है कब से सर-ए-शोरीदा का देना
चढ़ जाए नज़र कोई तो ये बोझ उतारें
“Since when is it acceptable to give the head to the wild? If anyone's gaze falls, let's remove this burden.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
शायर कब से जंगली सिर को भेंट देना स्वीकार करता है। यदि किसी की नज़र पड़ जाए, तो यह बोझ उतार दें।
विस्तार
यह शेर जीवन के दो पहलुओं को छूता है—एक तरफ़ बलिदान की तैयारी है, और दूसरी तरफ़ किसी की नज़र का बोझ। शायर कहते हैं कि उन्होंने कब से सर-ए-शोरीदा का देना मंज़ूर किया है, यानी वे जंग के लिए तैयार हैं। लेकिन असली बोझ तो उस नज़र का है जो पड़ जाए। यह बताता है कि कभी-कभी सबसे बड़ी जंग, किसी के प्यार या निगाहों के सामने भी होती है।
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