ग़ज़ल
कर नाला-कशी कब तईं औक़ात गुज़ारें
कर नाला-कशी कब तईं औक़ात गुज़ारें
यह ग़ज़ल पूछती है कि जब निराशा और भावनात्मक उथल-पुथल चरम पर है, तो कब तक इस 'नाला-कशी' (शिकायत/नाटक) का समय गुज़रेगा। शायर सवाल करते हैं कि किसे और कहाँ जाकर शिकायत की जाए, क्योंकि हर चीज़ का बिगड़ना अब कुछ हद तक छूट चुका है। यह ग़ज़ल जीवन की विडंबनाओं और भावनात्मक थकान को दर्शाती है, जहाँ दुःख की धाराएँ आँखों से बहना और दुनिया के ज़ुल्म का एहसास होना आम बात हो गई है।
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1
कर नाला-कशी कब तईं औक़ात गुज़ारें
फ़रियाद करें किस से कहाँ जा के पुकारें
कब नाला-कशी का समय मिलेगा, और हम अपना वक़्त कहाँ बिताएँगे? किससे शिकायत करें, और कहाँ जाकर पुकारें।
2
हर-दम का बिगड़ना तो कुछ अब छूटा है इन से
शायद किसी नाकाम का भी काम सँवारें
हर पल का बिगड़ना उनसे कुछ अब छूट गया है; शायद किसी नाकाम व्यक्ति का भी काम सँवारना पड़ जाए।
3
दिल में जो कभू जोश-ए-ग़म उठता है तो ता-देर
आँखों से चली जाती हैं दरिया की सी धारें
जब दिल में किसी तरह ग़म का जोश उठता है, तो थोड़ी देर के लिए आँख से नदी की तरह धारा बहने लगती है।
4
क्या ज़ुल्म है उस ख़ूनी-ए-आलम की गली में
जब हम गए दो-चार नई देखें मज़ारें
क्या उस दुनिया को ख़ून बहाने वाले की गली में कोई ज़ुल्म है, जब हम कुछ नई कब्रें देखने गए?
5
जिस जा कि ख़स-ओ-ख़ार के अब ढेर लगे हैं
याँ हम ने उन्हें आँखों से देखें हैं बहारें
जिन जगह पर कांटे और गुलाब के ढेर लगे हैं, हमने वहाँ खिलते हुए फूल (बहारें) अपनी आँखों से देखे हैं।
6
क्यूँकर के रहे शर्म मिरी शहर में जब आह
नामूस कहाँ उतरें जो दरिया पे इज़ारें
जब आहें मेरे शहर में शर्म महसूस करती हैं, तो यह कैसा व्यवहार है, जबकि सम्मान (नामूस) तो नदी के किनारे भी उतर नहीं सकता।
7
वे होंट कि है शोर-ए-मसीहाई का जिन की
दम लेवें न दो-चार को ता जी से न मारें
जिनके होंठ मसीहाई के झूठे शोर से भरे हैं, वे न तो किसी के कुछ जीवन लेते हैं और न ही किसी को मारते हैं।
8
मंज़ूर है कब से सर-ए-शोरीदा का देना
चढ़ जाए नज़र कोई तो ये बोझ उतारें
शायर कब से जंगली सिर को भेंट देना स्वीकार करता है। यदि किसी की नज़र पड़ जाए, तो यह बोझ उतार दें।
9
बालीं पे सर इक 'उम्र से है दस्त-ए-तलब का
जो है सो गदा किस कने जा हाथ पसारें
बालीं पे सर इक उम्र से है दस्त-ए-तलब का, जो है सो गदा किस कने जा हाथ पसारें। इसका शाब्दिक अर्थ है कि जन्म से ही एक इच्छा या लालच का हाथ है, और जो चीज़ अपनी है, उसे माँगने के लिए किस पास हाथ फैलाएँ।
10
उन लोगों के तो गर्द न फिर सब हैं लिबासी
सौ गज़ भी जो ये फाड़ें तो इक गज़ भी न वारें
उन लोगों के तो धूल का कण भी लिबास है, और अगर वे सौ गज भी फाड़ दें, तो एक गज को भी नुकसान नहीं होगा।
11
नाचार हो रुख़्सत जो मँगा भेजी तो बोला
मैं क्या करूँ जो 'मीर'-जी जाते हैं सुधारें
अगर मैं तुम्हारा विरह (जुदाई) माँगू, तो तुमने कहा, 'मैं क्या करूँ, मीर जी, मुझे सुधारना है।'
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