ग़ज़ल
जब से उस बेवफ़ा ने बाल रखे
जब से उस बेवफ़ा ने बाल रखे
यह ग़ज़ल एक ऐसे रिश्ते के दर्द और भावनात्मक उलझन को बयां करती है, जहाँ बेवफ़ाई ने न सिर्फ़ दिल तोड़ा है, बल्कि हर पल एक बेचैनी और ख़ौफ़नाक यादों का जाल बुन दिया है। शायर कहता है कि अब हर चीज़ में एक अजीब सा डर और ख़याल समाया हुआ है, और किसी को यह एहसास नहीं होगा कि वह किस दर्द से गुज़र रहा है।
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1
जब से उस बेवफ़ा ने बाल रखे
सैद बंदों ने जाल डाल रखे
जब से उस बेवफ़ा ने बाल रखे, सैद बंदों ने जाल डाल रखे। इस पंक्तियों का शाब्दिक अर्थ है कि जिस समय उस विश्वासघाती स्त्री ने अपने बाल खोले या छोड़े, उसी समय सैय्यद समुदाय के लोगों ने अपने जाल बिछा दिए।
2
हाथ क्या आवे वो कमर है हेच
यूँ कोई जी में कुछ ख़याल रखे
अर्थात, किसी व्यक्ति के मन में विचार रखने से हाथों या कमर का कोई कार्य नहीं हो सकता।
3
रह-रव-ए-राह ख़ौफ़नाक इश्क़
चाहिए पाँव को सँभाल रखे
राह-रव-ए-राह (रास्ते का शोर) और ख़ौफ़नाक इश्क़, दोनों ही पाँव को सँभाल रखने की माँग करते हैं।
4
पहुँचे हर इक न दर्द को मेरे
वो ही जाने जो ऐसा हाल रखे
मेरे हर दर्द को कौन पहुँचा है, यह तो वह ही जान सकता है जो मेरे इस हाल में है।
5
ऐसे ज़र दोस्त हो तो ख़ैर है अब
मलिए उस से जो कोई माल रखे
यदि तुम ऐसे मित्र हो, तो यह अच्छा है। किसी ऐसे व्यक्ति से बेहतर है जिसके पास धन हो।
6
बहस है नाक़िसों से काश फ़लक
मुझ को इस ज़ुमरे से निकाल रखे
शायर कहता है कि वह नासमझ लोगों से बहस करना बंद करना चाहता है और चाहता है कि यह दुनिया उसे इस समूह से हटा दे।
7
समझे अंदाज़ शे'र को मेरे
'मीर' का सा अगर कमाल रखे
यदि मैं 'मीर' की शैली में एक ऐसा शेर रच सकूँ, जिसमें उनके अद्भुत कौशल का मुकाबला करने वाला कमाल हो।
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