धूप में जलती हैं ग़ुर्बत वतनों की लाशें
तेरे कूचे में मगर साया-ए-दीवार न था
“In the sunlight, the corpses of impoverished lands burn, Yet in your alleyway, even the shadow of a wall was absent.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
अर्थात, जिस तरह से ग़रीबी और दरिद्रता वतन को जला रही है, उसी तरह तेरे रास्ते में भी कोई सहारा या आसरा नहीं था।
विस्तार
यह शेर बहुत गहरा है। शायर जी यहाँ एक बहुत बड़े विरोधाभास को सामने रख रहे हैं। एक तरफ़ तो ग़ुर्बत वतन की लाशें धूप में जल रही हैं—यह देश का दर्द है। लेकिन शायर कहते हैं कि उस दर्द से भी ज़्यादा तकलीफ तो उस महबूब के कूचे में है, जहाँ साया-ए-दीवार तक नहीं था। इसका मतलब है कि वतन का दर्द तो ज़ाहिर है, लेकिन दिल का खालीपन, उस महबूब के साथ का खालीपन, कहीं ज़्यादा भारी है।
