ग़ज़ल
क्या मुसीबत-ज़दा दिल माइल-ए-आज़ार न था
क्या मुसीबत-ज़दा दिल माइल-ए-आज़ार न था
यह ग़ज़ल उस दिल की व्यथा व्यक्त करती है जो मुसीबत और दर्द से भरा है, और जिसने कभी किसी प्रकार के कष्ट या विपदा का सामना नहीं किया। कवि कहते हैं कि अगर आदम ने इस दुनिया को जीवित नहीं किया होता, तो यह आईना (दुनिया) देखने लायक नहीं होता। यह ग़ज़ल वतन की ग़ुरबत और किसी भी बंधन या कैद से मुक्ति की भावना को भी दर्शाती है।
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1
क्या मुसीबत-ज़दा दिल माइल-ए-आज़ार न था
कौन से दर्द-ओ-सितम का ये तरफ़-दार न था
क्या मेरा दिल मुसीबत में पड़ने वाला, भटकने वाला और प्यार करने वाला नहीं था, या क्या यह दर्द और सितम का वह कोना नहीं था जो इसका तरफ़ बन गया था।
2
आदम-ए-ख़ाकी से आलम को जिला है वर्ना
आईना था ये वले क़ाबिल-ए-दीदार न था
आदम-ए-ख़ाकी से पूरे आलम को जीवन मिला है, वरना यह आईना किसी के देखने लायक़ नहीं था।
3
धूप में जलती हैं ग़ुर्बत वतनों की लाशें
तेरे कूचे में मगर साया-ए-दीवार न था
अर्थात, जिस तरह से ग़रीबी और दरिद्रता वतन को जला रही है, उसी तरह तेरे रास्ते में भी कोई सहारा या आसरा नहीं था।
4
सद गुलिस्ताँ ता-यक बाल थे उस के जब तक
ताइर-ए-जाँ क़फ़स-ए-तन का गिरफ़्तार न था
जब तक उसके बाल सद गुलिस्ताँ जितने खूबसूरत थे, तब तक वह समय था जब आत्मा का पक्षी शरीर के पिंजरे में कैद नहीं था।
5
हैफ़ समझा ही न वो क़ातिल नादाँ वर्ना
बे-गुनह मारने क़ाबिल ये गुनहगार न था
शायर कह रहा है कि वह न तो क़ातिल था और न ही नादान, क्योंकि वह बेगुनाह मरने के लायक़ गुनहगार नहीं था।
6
इश्क़ का जज़्ब हुआ बाइ'स-ए-सौदा वर्ना
यूसुफ़-ए-मिस्र ज़ुलेख़ा का ख़रीदार न था
यदि प्रेम का भाव नहीं होता, तो यूसुफ़-ए-मिस्र ज़ुलेख़ा का क्रेता नहीं होता।
7
नर्म-तर मोम से भी हम को कोई देती क़ज़ा
संग छाती का तो ये दिल हमें दरकार न था
नर्म-तर मोम से भी हमें कोई क़ज़ा नहीं देती, साथ छाती का तो ये दिल हमें दरकार नहीं था।
8
रात हैरान हूँ कुछ चुप ही मुझे लग गई 'मीर'
दर्द पिन्हाँ थे बहुत पर लब-ए-इज़हार न था
रात को मैं कुछ हैरान और चुप महसूस कर रहा हूँ, 'मीर'। बहुत दर्द मेरे अंदर थे, पर मेरे होंठ इज़हार करने के लिए तैयार नहीं थे।
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