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दस्त-कश नाला पेश-रौ गिर्या आह चलती है याँ इल्म ले कर

The hand-pulling sorrow presents tears, Does the sigh blow here, having acquired knowledge?

मीर तक़ी मीर
अर्थ

दस्त-कश नाला पेश-रौ गिर्या आह चलती है याँ इल्म ले कर अर्थात, यह हाथ खींचने वाला दुःख और आँसू प्रस्तुत करता है। क्या यहाँ ज्ञान प्राप्त करके आहें निकलती हैं।

विस्तार

यह शेर बताता है कि ग़म का इज़हार सिर्फ आँसू नहीं होते। जब आप किसी दर्द को कलाम बना देते हैं, जब आपके आह में इल्म का वज़न आ जाता है, तो वह नज़राना बन जाता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि विलाप और ज्ञान का ये संगम कितना गहरा होता है। यह सिर्फ़ दर्द नहीं, ये एक एहसास है जो दिमाग़ को छू जाता है।

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