ये हुआ मआल हुबाब का जो हवा में भर के उभर गया कि सदा है लुतमा-ए-मौज की सर-ए-पुर-ग़ुरूर किधर गया

“Such was the fate of the bubble that rose puffed up with pride, as the slap of the wave cries out: 'Where did that haughty head hide?'”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

हवा से फूलकर ऊपर उठने वाले बुलबुले का यह अंजाम हुआ कि लहर का थपेड़ा पुकार कर पूछ रहा है कि वह घमंड से भरा सिर अब कहाँ चला गया।

विस्तार

शायर यहाँ पानी के बुलबुले के ज़रिये इंसान के खोखले घमंड पर गहरी बात कहते हैं। बुलबुला जब हवा भरकर पानी की सतह पर इतराता हुआ उठता है, तो एक ही लहर का थपेड़ा उसे पलक झपकते ही मिटा देता है और तंज़िया अंदाज़ में पूछता है कि वो मग़रूर सर अब कहाँ गया? यह शेर हमें याद दिलाता है कि गुरूर कितना नाज़ुक और फ़ानी होता है, जिसे बिखरने में एक लम्हा भी नहीं लगता।

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