ग़ज़ल

ये हुआ मआल हुबाब का जो हवा में भर के उभर गया

یہ ہوا مآل حباب کا جو ہوا میں بھر کے ابھر گیا
नज़्म तबातबाई· Ghazal· 14 shers· radif: गया

यह ग़ज़ल बुलबुले के रूपक के ज़रिए जीवन की क्षणभंगुरता और अहंकार के विनाशकारी अंजाम पर विचार करती है। इसमें नियति के सामने इंसान की बेबसी को रेखांकित करते हुए प्रेम और हार्दिक लगन की उस शक्ति को दर्शाया गया है जो थके हुए साधक को भी निरंतर आगे बढ़ाती है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
ये हुआ मआल हुबाब का जो हवा में भर के उभर गया कि सदा है लुतमा-ए-मौज की सर-ए-पुर-ग़ुरूर किधर गया
हवा से फूलकर ऊपर उठने वाले बुलबुले का यह अंजाम हुआ कि लहर का थपेड़ा पुकार कर पूछ रहा है कि वह घमंड से भरा सिर अब कहाँ चला गया।
2
मुझे जज़्ब-ए-दिल ने ऐ जुज़ बहक के रखा क़दम कोई मुझे पर लगाए शौक़ ने कहीं थक के मैं जो ठहर गया
जब भी बहक कर मेरा कोई क़दम उठा तो दिल के जज़्बे ने मुझे संभाल लिया, और जब भी मैं थक कर कहीं ठहर गया तो मेरे शौक़ ने मुझे पर लगा दिए।
3
मुझे पीरी और शबाब में जो है इम्तियाज़ तो इस क़दर कोई झोंका बाद-ए-सहर का था मिरे पास से जो गुज़र गया
मेरे लिए बुढ़ापे और जवानी में बस इतना ही फ़र्क़ है कि जवानी सुबह की हवा के एक झोंके की तरह थी जो मेरे पास से होकर गुज़र गई।
4
असर उस के इश्वा-ए-नाज़ का जो हुआ वो किस से बयाँ करूँ मुझे तो अजल की है आरज़ू उसे वहम है कि ये मर गया
उसके नाज़-ओ-अंदाज़ का मुझ पर जो असर हुआ है, उसे मैं किससे बयान करूँ; मुझे तो बस मौत की तमन्ना है, जबकि उसे यह वहम हो गया है कि मैं मर चुका हूँ।
5
तुझे ऐ ख़तीब-ए-चमन नहीं ख़बर अपने ख़ुत्बा-ए-शौक़ में कि किताब-ए-गुल का वरक़ वरक़ तिरी बे-ख़ुदी से बिखर गया
हे चमन के उपदेशक, तुम्हें अपने प्रेम के भाषण की धुन में यह खबर नहीं रही कि तुम्हारी इस बेखुदी के कारण गुलाब की किताब का हर एक पन्ना बिखर गया है।
6
किसे तू सुनाता है हम-नशीं कि है इश्वा-ए-दुश्मन-ए-अक़्ल-ओ-दीं तिरे कहने का है मुझे यक़ीं मैं तिरे डराने से डर गया
ऐ दोस्त, तू किसे समझा रहा है कि महबूब का नाज़-ओ-अंदाज़ अक़्ल और धर्म का दुश्मन है? मुझे तेरी बात पर पूरा यक़ीन है, मानो मैं तेरे डराने से सचमुच डर गया हूँ।
7
करूँ ज़िक्र क्या मैं शबाब का सुने कौन क़िस्सा ये ख़्वाब का ये वो रात थी कि गुज़र गई ये वो नश्शा था कि उतर गया
मैं अपनी जवानी का ज़िक्र क्या करूँ, ख़्वाब जैसी इस दास्तान को कौन सुनेगा? वह तो ऐसी रात थी जो बीत गई और ऐसा नशा था जो उतर गया।
8
दिल-ए-ना-तवाँ को तकान हो मुझे उस की ताब न थी ज़रा ग़म-ए-इंतिज़ार से बच गया था नवेद-ए-वस्ल से मर गया
मेरे कमज़ोर दिल में ज़रा भी थकान बर्दाश्त करने की ताक़त नहीं थी। मैं इंतज़ार के दुख से तो बच गया था, लेकिन मिलन की ख़ुशख़बरी सुनते ही मेरी जान निकल गई।
9
मिरे सब्र-ओ-ताब के सामने न हुजूम-ए-ख़ौफ़-ओ-रजा रहा वो चमक के बर्क़ रह गई वो गरज के अब्र गुज़र गया
मेरे सब्र और सहनशीलता के आगे डर और उम्मीद का कोई असर न रहा; बिजली सिर्फ़ चमक कर शांत हो गई और गरजने वाला बादल भी बिना कुछ किए गुज़र गया।
10
मुझे बहर-ए-ग़म से उबूर की नहीं फ़िक्र ऐ मिरे चारा-गर नहीं कोई चारा-कार अब मिरे सर से आब गुज़र गया
ऐ मेरे इलाज करने वाले, मुझे अब दुख के इस समंदर को पार करने की कोई चिंता नहीं है। अब कोई उपाय काम नहीं आ सकता क्योंकि पानी मेरे सिर से ऊपर निकल चुका है।
11
मुझे राज़-ए-इश्क़ के ज़ब्त में जो मज़ा मिला है न पूछिए मय-ए-अँगबीं का ये घूँट था कि गले से मेरे उतर गया
इश्क़ के राज़ को दिल में छिपाए रखने में मुझे जो आनंद मिला है वह मत पूछिए; यह शहद जैसी मीठी शराब के एक घूँट की तरह था जो आसानी से मेरे गले से उतर गया।
12
नहीं अब जहान में दोस्ती कभी रास्ते में जो मिल गए नहीं मतलब एक को एक से ये इधर चला वो उधर गया
अब इस दुनिया में कोई दोस्ती बाकी नहीं रही है; अगर कभी रास्ते में लोग मिल भी जाएँ, तो किसी को एक-दूसरे से कोई मतलब नहीं होता, एक इस तरफ़ चला जाता है और दूसरा उस तरफ़ निकल जाता है।
13
अगर आ के ग़ुस्सा नहीं रहा तो लगी थी आग कि बुझ गई जो हसद का जोश फ़रो हुआ तो ये ज़हर चढ़ के उतर गया
अगर आकर गुस्सा शांत हो गया है, तो यह ऐसी आग थी जो लगकर बुझ गई; और यदि ईर्ष्या का उबाल धीमा पड़ गया, तो यह ज़हर चढ़कर उतर गया।
14
तुझे 'नज़्म' वादी-ए-शौक़ में अबस एहतियात है इस क़दर कहीं गिरते गिरते सँभल गया कहीं चलते चलते ठहर गया
ऐ 'नज़्म', इश्क़ की वादी में इतनी व्यर्थ सावधानी बरतने का क्या फ़ायदा, जहाँ तू कभी गिरते-गिरते संभल जाता है और कभी चलते-चलते अचानक रुक जाता है।
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