“O preacher of the garden, in your sermon of longing you do not see, that every leaf of the rose's book has scattered in your ecstasy.”
हे चमन के उपदेशक, तुम्हें अपने प्रेम के भाषण की धुन में यह खबर नहीं रही कि तुम्हारी इस बेखुदी के कारण गुलाब की किताब का हर एक पन्ना बिखर गया है।
इस शेर में शायर 'ख़तीब-ए-चमन' यानी बाग़ के उपदेशक (जैसे बुलबुल या बाद-ए-सबा) को बड़ी नफ़ासत से समझाते हैं। वह अपने इश्क़ के जोश और तक़रीर में इतना बेख़ुद हो गया है कि उसे ख़बर ही नहीं कि उसकी इस दीवानगी से फूल की नाज़ुक पंखुड़ियाँ, जो किसी किताब के पन्नों जैसी थीं, बिखर कर तबाह हो गई हैं। यह शेर हमें याद दिलाता है कि कभी-कभी हद से गुज़रा हुआ जुनून और अंधा जोश अनजाने में उसी हुस्न को चोट पहुँचा बैठता है जिससे वह बेइंतहा प्यार करता है।
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