तुझे 'नज़्म' वादी-ए-शौक़ में अबस एहतियात है इस क़दर कहीं गिरते गिरते सँभल गया कहीं चलते चलते ठहर गया

“O Nazm, in the valley of passion, why such futile caution do you show? Here, catching yourself just as you stumble; there, halting mid-stride as you go.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

ऐ 'नज़्म', इश्क़ की वादी में इतनी व्यर्थ सावधानी बरतने का क्या फ़ायदा, जहाँ तू कभी गिरते-गिरते संभल जाता है और कभी चलते-चलते अचानक रुक जाता है।

विस्तार

शायर यहाँ बड़े अपनेपन से खुद को समझा रहे हैं कि इश्क़ की राह में इतनी हिचकिचाहट और सावधानी का भला क्या काम! 'वादी-ए-शौक़' यानी दिल की दुनिया तो बेपरवाह होकर डूब जाने की जगह है, कदम-कदम पर हिसाब लगाने की नहीं। बार-बार लड़खड़ा कर संभलना या डरकर चलते-चलते ठिठक जाना यह दिखाता है कि अक्ल अभी भी दिल पर हावी है, जबकि मोहब्बत तो खुद को बेझिझक सौंप देने की मांग करती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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