ऐ 'नज़्म' वस्ल में भी रहा तू न चैन से दिल को हुआ क़रार तो है बे-क़रार हाथ

“Even in union, O Nazm, you knew no peace or calm; the heart was finally soothed, yet restless grew the hand.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

ऐ नज़्म, महबूब के मिलन में भी तुम्हें चैन न मिला; जब दिल को सुकून हासिल हुआ, तो हाथ बेचैन हो उठा।

विस्तार

यह शेर मिलन के उस खूबसूरत और बेचैन अहसास को बयां करता है जहां इंसान कभी पूरी तरह शांत नहीं हो पाता। हम सोचते हैं कि महबूब के करीब आते ही चैन मिल जाएगा, और दिल को तसल्ली मिलती भी है, मगर तभी हाथों की बेकरारी शुरू हो जाती है—उन्हें छूने और थाम लेने की चाह में। 'नज़्म' बड़ी नफ़ासत से दिखाते हैं कि इश्क़ में सुकून कभी मुकम्मल नहीं होता; दिल संभलता है तो जिस्मानी तमन्ना मचल उठती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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