ग़ज़ल

यूँ तो न तेरे जिस्म में हैं ज़ीनहार हाथ

یوں تو نہ تیرے جسم میں ہیں زینہار ہاتھ
नज़्म तबातबाई· Ghazal· 11 shers· radif: हाथ

इस ग़ज़ल में 'हाथ' के रूपक के माध्यम से ईश्वर की असीम कृपा और मानवीय आकांक्षाओं व वासनाओं का सुंदर चित्रण किया गया है। शायर एक ओर जहां परमेश्वर की असीम उदारता का वंदन करता है, वहीं दूसरी ओर मानवीय तड़प, बेचैनी और मय-ओ-इश्क़ की बेबसी को बयां करता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
यूँ तो न तेरे जिस्म में हैं ज़ीनहार हाथ देने के ऐ करीम मगर हैं हज़ार हाथ
यूँ तो तेरे वजूद में कोई हाथ नहीं है, लेकिन ऐ बेहद सख़ी ईश्वर, दूसरों को देने और नवाज़ने के लिए तेरे हज़ारों हाथ हैं।
2
अंगड़ाइयों में फैलते हैं बार बार हाथ शीशा की सम्त बढ़ते हैं बे-इख़्तियार हाथ
अंगड़ाई लेते हुए हाथ बार-बार फैलते हैं और फिर बेबस होकर खुद-ब-खुद जाम या शीशे की ओर बढ़ जाते हैं।
3
डूबे हैं तर्क-ए-सइ से अफ़सोस तो ये है साहिल था हाथ भर पे लगाते जो चार हाथ
अफ़सोस इस बात का है कि हम कोशिश छोड़ देने की वजह से डूबे, वरना अगर तैरते हुए चार हाथ और मार लेते तो किनारा बस हाथ भर की दूरी पर था।
4
आती है जब नसीम तो कहती है मौज-ए-बहर यूँ आबरू समेट अगर हों हज़ार हाथ
जब मंद हवा चलती है, तो समुद्र की लहर कहती है कि भले ही तुम्हारे हज़ार हाथ हों, अपनी आबरू और मर्यादा को इसी तरह समेट कर रखना चाहिए।
5
दरपय हैं मेरे क़त्ल के अहबाब और मैं ख़ुश हूँ कि मेरे ख़ून में रंगते हैं यार हाथ
मेरे दोस्त मेरी जान लेने पर तुले हैं और मैं इस बात पर ख़ुश हूँ कि मेरे अपने ही यार अपने हाथ मेरे ख़ून से रंग रहे हैं।
6
दामन-कशाँ चली है बदन से निकल के रूह खिंचते हैं फैलते हैं जो यूँ बार बार हाथ
रूह अपना दामन छुड़ाते हुए शरीर से बाहर निकल रही है, शायद इसीलिए हाथ बार-बार फैलते और खिंचते हैं।
7
मिटता नहीं नविश्ता-ए-क़िस्मत किसी तरह पत्थर से सर को फोड़ कि ज़ानू पे मार हाथ
क़िस्मत का लिखा किसी भी तरह नहीं मिट सकता, चाहे तुम पत्थर से अपना सिर फोड़ लो या अफ़सोस में अपने घुटनों पर हाथ मार लो।
8
साक़ी सँभालना कि है लबरेज़ जाम-ए-मय लग़्ज़िश है मेरे पाँव में और राशा-दार हाथ
हे साक़ी, मुझे सँभालना क्योंकि शराब का प्याला लबालब भरा हुआ है, मेरे पैर लड़खड़ा रहे हैं और हाथ काँप रहे हैं।
9
मुतरिब से पूछ मसअला-ए-जब्र-ओ-इख़्तियार क्या ताल सम पे उठते हैं बे-इख़्तियार हाथ
संगीतकार से मजबूरी और स्वतंत्रता का मसला पूछिए, कि क्या ताल की सम पर हाथ बिना अपने वश के खुद-ब-खुद उठ जाते हैं।
10
मैं और हूँ अलाएक-ए-दुनिया के दाम में मेरा न एक हाथ न उस के हज़ार हाथ
मैं सांसारिक बंधनों के जाल में एक अजीब हाल में फंसा हुआ हूँ; न तो मेरे पास खुद को बचाने के लिए एक भी हाथ है और न ही किसी के पास मदद के लिए हज़ार हाथ हैं।
11
ऐ 'नज़्म' वस्ल में भी रहा तू न चैन से दिल को हुआ क़रार तो है बे-क़रार हाथ
ऐ नज़्म, महबूब के मिलन में भी तुम्हें चैन न मिला; जब दिल को सुकून हासिल हुआ, तो हाथ बेचैन हो उठा।
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