मुतरिब से पूछ मसअला-ए-जब्र-ओ-इख़्तियार क्या ताल सम पे उठते हैं बे-इख़्तियार हाथ

“Ask the minstrel of the riddle of destiny and free will: do hands clap to the rhythm's beat unbidden, helpless still?”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

संगीतकार से मजबूरी और स्वतंत्रता का मसला पूछिए, कि क्या ताल की सम पर हाथ बिना अपने वश के खुद-ब-खुद उठ जाते हैं।

विस्तार

शायर किस्मत और मर्ज़ी (जब्र और इख़्तियार) के सदियों पुराने दार्शनिक सवाल को संगीत के ज़रिए बड़े ख़ूबसूरत अंदाज़ में समझाते हैं। जब संगीत अपनी लय या 'सम' पर पहुँचता है, तो क्या हमारे हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद ताल देने के लिए बेबस होकर नहीं उठ पड़ते? यह दिखाता है कि जब हम किसी गहरे अहसास या कला में डूब जाते हैं, तो अपनी आज़ादी और समर्पण के बीच का फ़र्क ही मिट जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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