मिटता नहीं नविश्ता-ए-क़िस्मत किसी तरह पत्थर से सर को फोड़ कि ज़ानू पे मार हाथ

“By no means can the decree of fate be erased; dash your head against a stone, or beat your hands upon your knees.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

क़िस्मत का लिखा किसी भी तरह नहीं मिट सकता, चाहे तुम पत्थर से अपना सिर फोड़ लो या अफ़सोस में अपने घुटनों पर हाथ मार लो।

विस्तार

यह शेर क़िस्मत की अटल सच्चाई और इंसान की बेबसी को बेहद तीखे ढंग से बयां करता है। शायर कहता है कि जो मुक़द्दर में लिख दिया गया, उसे बदला नहीं जा सकता—चाहे इंसान ग़म और गुस्से में अपना सिर पत्थर से फोड़ ले या पछतावे में घुटने पीटता रह जाए। 'सिर फोड़ना' और 'ज़ानू (घुटने) पर हाथ मारना' बेइंतहा लाचारी की जीवंत तस्वीरें हैं, जो बताती हैं कि नियति के आगे हमारी हर चीख़ बेअसर है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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