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ग़ज़ल

कितना पागल...

کتنا پاگل...
सुरेश दलाल· Ghazal· 8 shers

यह ग़ज़ल एक प्रेमी की तीव्र, सर्वग्राही दीवानगी को दर्शाती है, जो अपने प्रिय को हर जगह देखता है। कवि एक ऐसी दुनिया रचता है जहाँ पेड़, फूल, पानी और गुंजार करते भौंरे भी प्रिय के नाम और उपस्थिति से जुड़े हुए हैं, जो एक गहरी, लगभग जुनूनी भक्ति और प्रेमी के इस प्रेम में पूर्ण विसर्जन को उजागर करता है। प्रेम की नदी बहती है, और कवि उसके जल में सांत्वना और अपनी पहचान पाता है।

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1
પૂછતી નહીં કેટલો પાગલ... કેટલો પાગલ આભમાં જોને કેટલાં વાદળ... એટલો પાગલ...
मत पूछो मैं कितना पागल हूँ, बस आकाश में देखो कितने बादल हैं, उतना ही मैं पागल हूँ।
2
ઝાડનું નાનું ગામ વસાવ્યું ને ફૂલને તારું નામ દીધું છે. ભમરા તને ગુંજ્યા કરેઃ ગુંજવાનું મેં કામ દીધું છે.
मैंने पेड़ों का एक छोटा गाँव बसाया और फूल को तुम्हारा नाम दिया है। भौंरे तुम्हारे लिए गुंजार करते रहते हैं, गुंजार करने का काम मैंने ही उन्हें दिया है।
3
જળને તારું નામ દઈ ઢંઢોળી લેતો. ખોવાઈ ગયેલા નામને મારા ખોળી લેતો.
मैं पानी को तुम्हारा नाम देकर हिलाता, और उसमें अपना खोया हुआ नाम खोज लेता.
4
નદી તારા નામની વહે : એ જ નદીનું જળ પીધું છે. આપણા પ્રેમની : સુખની દુખની વાત કરું છું શબ્દો આગળ.
कवि कहता है कि वह अपने प्रिय के नाम रूपी नदी के जल से ही पोषित हुआ है। वह अपने प्रेम के सुख-दुख की कहानी कहता है, जो शब्दों से भी अधिक गहरी है।
5
પૂછતી નહીં કેટલો પાગલ... કેટલો પાગલ... પ્હાડની ઉપર સૂરજ ઊગ્યો : રાતના ઊગ્યા તારા.
वह नहीं पूछती कि मैं कितना पागल हूँ। पहाड़ के ऊपर सूरज उगा और रात में तारे निकले।
6
દિવસ અને રાત તો તારા નામના છે વણજારા. ધરતીમાંથી નામનાં તારા તરણાં ફૂટે.
हे बंजारे, दिन और रात तुम्हारे नाम के हैं। धरती से भी तुम्हारे नाम के तिनके फूटते हैं।
7
ઝરણાં તારા નામને ઝીણા લયમાં ઘૂંટે. સાગર, ખડક, પવન, સડક, ઝૂંપડી, મકાન...સૌને તારું નામ કીધું છે.
झरने तुम्हारे नाम को धीमी लय में गुनगुनाते हैं। सागर, चट्टान, हवा, सड़क, झोपड़ी, मकान... इन सभी को तुम्हारा नाम बताया गया है।
8
નામ તો તારું ગીતને માટે સાવ કુંવારો કોરો કાગળ... પૂછતી નહીં કેટલો પાગલ... કેટલો પાગલ...
गीत के लिए तुम्हारा नाम एक बिलकुल कोरा, साफ पन्ना है। यह मत पूछो कि मैं कितना पागल हूँ, कितना पागल।
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