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ग़ज़ल

नींद-दरिये

نیند-دریے
सुरेश दलाल· Ghazal· 6 shers

यह ग़ज़ल दिन से रात में बदलाव का सुंदर चित्रण करती है, जहाँ डूबता सूरज 'नींद के दरिया' में डूबकर सपनों के सरोवर में चाँद बनकर फिर से उगता है। यह रात की शांत खामोशी और दिन के बोझ से मिलने वाली ठंडी, सुगंधित राहत का वर्णन करती है।

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1
સૂરજ નીંદર – દરિયે ડૂબ્યો! શમણાંને સરવરિયે પાછો ચાંદ થઈને ઊગ્યો!
सूरज नींद में समुद्र में डूब गया। सपनों के लिए, वह तालाब में चाँद बनकर फिर से उगा।
2
પંખીઓના ટહૌકા સૂતા વૃક્ષ – ડાળને માળે : તારલિયાની કશી ગુફતગુ મૌનતણે અજવાળે.
पक्षियों के कलरव वृक्ष की डालियों पर अपने घोंसलों में सो रहे हैं, और तारों की एक शांत गुफ्तगू खामोशी के उजाले में चल रही है।
3
દિન આખાનો ભાર બધો યે મલયસમીરે
दिन भर का सारा बोझ मलय समीर द्वारा धीरे से हर लिया जाता है।
4
રાતરાણીની પાસે જઈને એક્કી શ્વાસે મૂક્યો! લૂ દાઝ્યા લોચનિયે શીતળ સુગંધની શી છાલક :
रात-रानी के पास जाकर एक ही साँस में कहा गया! लू से झुलसी आँखों के लिए शीतल सुगंध की कैसी फुहार!
5
સુખ-વ્યાકુલ અંતરને કનડે તોફાની આ ટાઢક. લળી લળીને દિશા દિશાથી
यह तूफानी ठंडक उस हृदय को सताती है जो सुख में भी व्याकुल है। झुक-झुककर, यह हर दिशा से आती है।
6
રસવાદળીએ વળી વળીને વીંટળાઈને ચાંદલિયાને ચૂમ્યો!
आनंद के बादल ने बार-बार मुड़कर, छोटे चाँद को गले लगाकर चूमा।
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