गुनाहगारों ने देखा जमाल-ए-रहमत को कहाँ नसीब ये होता जो बे-ख़ता होते

“It was the sinners who beheld the splendor of grace divine; could such a fortune be theirs, had they been free of sin?”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

गुनाहगारों ने ही ईश्वर की दया और रहमत के सौंदर्य का दर्शन किया है; यदि वे निष्पाप होते, तो उन्हें यह सौभाग्य कभी प्राप्त न होता।

विस्तार

शायर यहाँ एक बहुत ख़ूबसूरत और राहत देने वाली बात कह रहे हैं कि ईश्वर की रहमत का असली नूर वही देख पाते हैं जिन्हें माफ़ी की तलब होती है। अगर इंसान से कभी कोई भूल ही न होती, तो वह बे-ऐब तो रहता मगर उस बेपनाह करुणा और दया के जादुई एहसास से महरूम रह जाता। यह शेर हमें समझाता है कि हमारी ख़ताएँ और कमज़ोरियाँ ही हमें उस परवरदिगार के सबसे क़रीब लाती हैं, जहाँ उसका रहमो-करम खुलकर बरसता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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