“It was the sinners who beheld the splendor of grace divine; could such a fortune be theirs, had they been free of sin?”
गुनाहगारों ने ही ईश्वर की दया और रहमत के सौंदर्य का दर्शन किया है; यदि वे निष्पाप होते, तो उन्हें यह सौभाग्य कभी प्राप्त न होता।
शायर यहाँ एक बहुत ख़ूबसूरत और राहत देने वाली बात कह रहे हैं कि ईश्वर की रहमत का असली नूर वही देख पाते हैं जिन्हें माफ़ी की तलब होती है। अगर इंसान से कभी कोई भूल ही न होती, तो वह बे-ऐब तो रहता मगर उस बेपनाह करुणा और दया के जादुई एहसास से महरूम रह जाता। यह शेर हमें समझाता है कि हमारी ख़ताएँ और कमज़ोरियाँ ही हमें उस परवरदिगार के सबसे क़रीब लाती हैं, जहाँ उसका रहमो-करम खुलकर बरसता है।
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