ग़ज़ल
न बहते अश्क तो तासीर में सिवा होते
نہ بہتے اشک تو تاثیر میں سوا ہوتے
यह ग़ज़ल अनकहे दर्द और संयमित आंसुओं के गहरे प्रभाव को दर्शाती है, जिन्हें सीप में बंद अनमोल मोतियों के समान माना गया है। इसके साथ ही, यह बाह्य धार्मिकता और पाखंड पर कटाक्ष करते हुए सच्चे ईश्वरीय प्रेम में निष्कपटता व आत्मीयता का आह्वान करती है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
न बहते अश्क तो तासीर में सिवा होते
सदफ़ में रहते ये मोती तो बे-बहा होते
अगर ये आँसू न बहते तो इनका असर और भी ज़्यादा होता; अगर ये मोती सीप के अंदर ही रहते तो अनमोल होते।
2
मुझ ऐसे रिंद से रखते ज़रूर ही उल्फ़त
जनाब-ए-शैख़ अगर आशिक़-ए-ख़ुदा होते
अगर शैख़ साहब वास्तव में ईश्वर के सच्चे प्रेमी होते, तो वे मुझ जैसे शराबी और पापी से भी ज़रूर प्रेम रखते।
3
गुनाहगारों ने देखा जमाल-ए-रहमत को
कहाँ नसीब ये होता जो बे-ख़ता होते
गुनाहगारों ने ही ईश्वर की दया और रहमत के सौंदर्य का दर्शन किया है; यदि वे निष्पाप होते, तो उन्हें यह सौभाग्य कभी प्राप्त न होता।
4
जनाब-ए-हज़रत-ए-नासेह का वाह क्या कहना
जो एक बात न होती तो औलिया होते
माननीय उपदेशक (नासेह) की क्या ही बात है, अगर उनमें बस यह एक ख़ामी या आदत न होती तो वे अवश्य ही कोई वली (संत) होते।
5
मज़ाक़-ए-इश्क़ नहीं शेख़ में ये है अफ़्सोस
ये चाशनी भी जो होती तो क्या से क्या होते
बड़ा अफ़सोस है कि शेख़ में इश्क़ का कोई ज़ौक़ नहीं है, अगर उनमें यह मिठास भी होती तो वे न जाने क्या से क्या बन जाते।
6
महल्ल-ए-शुक्र हैं 'अकबर' ये दरफ़शाँ नज़्में
हर इक ज़बाँ को ये मोती नहीं अता होते
हे अकबर, ये चमकती हुई कविताएँ ईश्वर का शुक्र अदा करने का अवसर हैं, क्योंकि शायरी के ये अनमोल मोती हर ज़बान को नसीब नहीं होते।
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