“Alas, the pious Sheikh lacks the refined taste of love; had he this sweetness too, what wondrous heights he would have risen to.”
बड़ा अफ़सोस है कि शेख़ में इश्क़ का कोई ज़ौक़ नहीं है, अगर उनमें यह मिठास भी होती तो वे न जाने क्या से क्या बन जाते।
इस शेर में शायर शेख़ (धर्मगुरु) पर एक मीठी सी चुटकी लेते हुए अफ़सोस जताते हैं कि उनके पास ज्ञान और परहेज़गारी तो है, पर दिल में 'इश्क़' का ज़ायका नहीं है। यहाँ इश्क़ को 'चाशनी' कहा गया है, जो किसी भी इबादत और ज़िंदगी के रूखेपन को मिठास और नरमी से भर देती है। शायर का मानना है कि अगर इस तक़वे के साथ मुहब्बत का हुस्न भी जुड़ जाता, तो इंसानियत और रूहानियत का मर्तबा कहीं और ही ऊँचा होता।
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