“When at the very dawn of love it is already burning, what on earth can I say of the heart's final fate?”
जब मोहब्बत की शुरुआत में ही दिल जल रहा है, तो फिर मैं इसके अंतिम अंजाम के बारे में क्या ख़ाक बताऊँ।
शायर यहाँ इश्क़ की शुरुआत के उस बेबस एहसास को बयां कर रहे हैं, जहाँ मोहब्बत का पहला क़दम रखते ही दिल दर्द की आग में जलने लगा है। अगर सफ़र के आग़ाज़ में ही इतनी तपिश और बेचैनी है, तो भला कोई इसके अंजाम का क्या अंदाज़ा लगाएगा? 'क्या ख़ाक' लफ़्ज़ में एक गहरा दर्द और तंज़ छुपा है, जो इशारा करता है कि इस आग में दिल का मुक़द्दर आख़िरकार जलकर ख़ाक यानी राख हो जाना ही है।
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