न कर फ़िक्र-ए-ख़िज़ाब ऐ शैख़ तू पीरी में जाने दे जवाँ होना नहीं मुमकिन सियह-रूई से क्या हासिल

“Fret not over hair dye, O Shaikh, let your old age be; youth cannot return—what will a blackened face gain thee?”

— बहादुर शाह ज़फ़र
अर्थ

ऐ शेख़, बुढ़ापे में बालों को रंगने की चिंता मत करो और इसे ऐसे ही रहने दो। दोबारा जवान होना मुमकिन नहीं है, तो अपने बाल काले करने और बदनामी मोल लेने से क्या हासिल होगा?

विस्तार

इस शेर में शायर शैख़ साहब पर चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि बुढ़ापे को छुपाने के लिए बालों पर खिज़ाब (डाई) लगाने की फ़िक्र छोड़ दीजिए। यहाँ 'सियह-रूई' लफ़्ज़ में कमाल का खेल है—इसका एक मतलब बाल काले करना है, तो दूसरा मुँह काला होना यानी रुसवाई और शर्मिंदगी। शायर समझाते हैं कि बनावट से जवानी तो लौट नहीं सकती, फिर बुढ़ापे में इस बेजा दिखावे से दुनिया में बदनामी मोल लेने का क्या हासिल?

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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