ग़ज़ल
न दो दुश्नाम हम को इतनी बद-ख़़ूई से क्या हासिल
نہ دو دشنام ہم کو اتنی بد خوئی سے کیا حاصل
इस ग़ज़ल में शायर अपने महबूब की बेरुख़ी, तल्ख़ रवैये और बेवजह की दिल-आज़ारी पर नाज़-ओ-नख़रे के साथ शिकवा करता है। वह कहता है कि जब दिल पूरी तरह टूट चुका हो, तो बाद में की जाने वाली तसल्ली और दिलजोई का कोई हासिल नहीं रह जाता।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
न दो दुश्नाम हम को इतनी बद-ख़़ूई से क्या हासिल
तुम्हें देना ही होगा बोसा ख़म-रूई से क्या हासिल
मुझे गालियाँ मत दो, इतना बुरा स्वभाव दिखाने से क्या हासिल होगा? तुम्हें चुंबन तो देना ही पड़ेगा, फिर यह मुँह फुलाने या त्योरियाँ चढ़ाने से क्या फ़ायदा?
2
दिल-आज़ारी ने तेरी कर दिया बिल्कुल मुझे बे-दिल
न कर अब मेरी दिल-जूई कि दिल-जूई से क्या हासिल
तुम्हारी दिल दुखाने की आदत ने मुझे पूरी तरह बेदिल (निराश और टूटा हुआ) कर दिया है। अब मेरी दिलजोई मत करो, क्योंकि अब इस तसल्ली से क्या हासिल होगा।
3
न जब तक चाक हो दिल फाँस कब दिल की निकलती है
जहाँ हो काम ख़ंजर का वहाँ सूई से क्या हासिल
जब तक दिल को चीर न दिया जाए तब तक उसमें चुभी फाँस नहीं निकल सकती, और जहाँ खंजर की ज़रूरत हो वहाँ सूई से कोई फ़ायदा नहीं होता।
4
बुराई या भलाई गो है अपने वास्ते लेकिन
किसी को क्यूँ कहें हम बद कि बद-गूई से क्या हासिल
यद्यपि किसी की अच्छाई या बुराई उसी के अपने लिए होती है, फिर भी हम किसी को बुरा क्यों कहें क्योंकि किसी की बुराई करने से क्या हासिल होगा?
5
न कर फ़िक्र-ए-ख़िज़ाब ऐ शैख़ तू पीरी में जाने दे
जवाँ होना नहीं मुमकिन सियह-रूई से क्या हासिल
ऐ शेख़, बुढ़ापे में बालों को रंगने की चिंता मत करो और इसे ऐसे ही रहने दो। दोबारा जवान होना मुमकिन नहीं है, तो अपने बाल काले करने और बदनामी मोल लेने से क्या हासिल होगा?
6
चढ़ाए आस्तीं ख़ंजर-ब-कफ़ वो यूँ जो फिरता है
उसे क्या जाने है उस अरबदा-जूई से क्या हासिल
वह जो आस्तीनें चढ़ाए और हाथ में ख़ंजर लिए इस तरह घूम रहा है, कौन जाने उसे इस झगड़े और फ़साद की तलाश से क्या हासिल होगा।
7
अबस पम्बा न रख दाग़-ए-दिल-ए-सोज़ाँ पे तू मेरे
कि अंगारे पे होगा चारागर रूई से क्या हासिल
ऐ चारागर, मेरे जलते हुए दिल के ज़ख़्म पर बेकार में रुई मत रख। दहकते हुए अंगारे पर रुई रखने से आख़िर क्या फ़ायदा होगा?
8
शमीम-ए-ज़ुल्फ़ हो उस की तो हो फ़रहत मिरे दिल को
सबा होवेगा मुश्क-चीं की ख़ुशबूई से क्या हासिल
अगर महबूब की ज़ुल्फ़ों की महक हो तभी मेरे दिल को ख़ुशी और सुकून मिल सकता है; ऐ सबा, चीन के कस्तूरी की ख़ुशबू से मुझे क्या हासिल होगा?
9
न होवे जब तलक इंसाँ को दिल से मेल-ए-यक-जानिब
'ज़फ़र' लोगों के दिखलाने को यकसूई से क्या हासिल
जब तक इंसान का दिल सच्चे तौर पर किसी एक ओर न झुके, ऐ ज़फ़र, सिर्फ़ लोगों को दिखाने के लिए एकाग्रता या निष्ठा का दिखावा करने से क्या हासिल?
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
