“Lay not cotton in vain upon the wound of my burning heart; O healer, what can cotton ever achieve upon a glowing ember?”
ऐ चारागर, मेरे जलते हुए दिल के ज़ख़्म पर बेकार में रुई मत रख। दहकते हुए अंगारे पर रुई रखने से आख़िर क्या फ़ायदा होगा?
इस शेर में शायर अपने चारागर यानी हकीम से मुख़ातब होकर कहता है कि उसके ज़ख़्मों पर रुई रखकर मरहम-पट्टी करना सरासर फ़िज़ूल है। उसका दिल इश्क़ और हिज्र की आग में जलकर एक दहकता हुआ अंगारा बन चुका है, और अंगारे पर रुई रखने से घाव भरने के बजाय वह ख़ुद खाक हो जाएगी। यह पुरअसर तशबीह साफ़ करती है कि दिल की अंदरूनी तड़प और गहरा सोज़ दुनियावी इलाजों की पहुंच से बहुत दूर है।
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